आंखों में रोशनी नहीं, लेकिन छात्रों के जीवन में कर रहे उजियारा

रायपुर। ‘कुदरत के खजाने में किसी चीज की कमी नहीं, खोजने से कोहिनूर भी मिल जाता है। अंधेरे में चलते हैं जो मंजिल तलाशने, खुदा उनके लिए खुद चराग बन जाता है।’ जी हां, इसे चरितार्थ कर दिखाया है रायपुर के दिव्यांग (नेत्र) शिक्षक दंपति एम. गुरुनाथ और एम.उमा रानी ने, जिन्हें खुदा ने रोशनी से तो नहीं नवाजा है, लेकिन ज्ञान की ज्योति भरपूर दी है। ये दंपति विगत 25 वर्षों से समाज में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं।

इन्होंने अपनी दिव्यांगता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। समाज की तमाम तानाकशी व कठिनाइयों के बावजूद इस दंपति ने हार नहीं मानी और शिक्षा की अलख जगाने निकल पड़े। आज आलम यह है कि बच्चे, अभिभावक और अन्य तमाम लोग इनकी पढ़ाने की शैली के मुरीद हैं। फिलहाल एम. गुरुनाथ गोकुलराम वर्मा शासकीय प्राथमिक शाला रामनगर और उनकी पत्नी एम. उमा रानी शासकीय दृष्टि एवं श्रवण बाधित विद्यालय मठपुरैना में पढ़ा रही हैं।

एम. गुरुनाथ ने बताया- जब मैंने होश संभाला तो मेरे जीवन में अंधकार ही अंधकार था। उसी समय मैंने ठाना कि मुझे इसी को हथियार बनाना है और समाज में शिक्षा की जोत जलानी है। उसी समय से मैंने मेहनत शुरू की और आज इस मुकाम पर पहुंचा हूं। हमारे दो बच्चे हैं, जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। गुरुनाथ की पत्नी एम. उमा रानी ने बताया कि दिव्यांग होना तो जैसे गुनाह है। समाज ऐसे भी दिव्यांगों को हेय दृष्टि से देखता है। आज अगर हमें सम्मान दिया जा रहा है, वह शिक्षा की ही देन है।

समाज व अधिकारियों से मिलता था ताना

जब किसी की आंख में इंफेक्शन हो जाता है या फिर एक मामूली-सा कीड़ा पड़ जाता है तो वह परेशान हो जाता है। फौरन डॉक्टर के पास जाता है, लेकिन उनका क्या, जिन्हें खुदा ने ही आंखों में रोशनी नहीं दी, जिनकी दुनिया में केवल अंधकार ही अंधकार है। इसके बावजूद वे इसी दिव्यांगता को हथियार बनाकर समाज के लिए बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं।

इस सफर को तय करने में इन दोनों को जहां बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, वहीं समाज के कुछ लोगों से तानाकशी भी सुनने को मिली। गुरुनाथ ने बताया कि उनकी जिंदगी बचपन से ही चुनौतीपूर्ण रही। उन्हें कई बार दिव्यांग होने का ताना भी सुनने को मिला।

उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि जब मेरा प्रधानाध्यापक बनने का लेटर आया तो अधिकारी ने मुझसे सवाल किया कि आप कैसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभा पाएंगे? आप तो दिव्यांग हैं। उसके बाद हमने ऐसा काम कर दिखाया कि आज वहीं लोग दूसरे को मिसाल देते हैं।

दंपति ऐसे जगा रहे हैं शिक्षा की अलख

एक दिव्यांग के लिए शिक्षा ग्रहण करना व पढ़ाना दोनों चुनौतीपूर्ण है, लेकिन शिक्षा व समाज के लिए समर्पित इस दंपति ने इस चुनौती को स्वीकार किया। दोनों अलग-अलग स्कूल में अध्यापन कर रहे हैं। ये दोनों ब्रेन लिपि के माध्यम से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इन दोनों में एम. गुरुनाथ एक सामान्य स्कूल में पढ़ा रहे हैं।

इनके लिए पहले सामान्य बच्चों को पढ़ाना चुनौती भरा था, लेकिन इनकी पढ़ाने की शैली इस प्रकार है कि ब्रेन लिपि के माध्यम से पढ़ाने के बाद भी बच्चों को सारे पाठ आसानी से कंठस्थ हो जाते हैं।