उज्जैन संभाग में जिसने ज्यादा सीटें जीतीं, सरकार उसी की बनी

उज्जैन। विधानसभा चुनाव में कांटे का मुकाबला होने की संभावना के बीच दोनों प्रमुख दलों को संभाग की 29 सीटों से खासी उम्मीद है। बीते चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि यहां के मतदाता सरकार बनाने में अहम रोल निभाते आए हैं। 1998 से लेकर 2013 तक जिस भी दल ने यहां ज्यादा सीटें जीतीं, उसकी सरकार बनी। इस बार भाजपा बीते चुनाव के प्रदर्शन को दोहराना चाहेगी तो कांग्रेस अपनी खोई प्रतिष्ठा हासिल करना चाहती है। वर्ष 1998 में 29 में से 22 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार जीते थे। एक सीट (सैलाना, रतलाम) निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई थी।

कांग्रेस सत्ता में आई और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने। 2003 में एंटी इंकमबेंसी देखने को मिली। संभाग में कांग्रेस चार सीटों पर सिमटकर रह गई। एक सीट निर्दलीय को मिली। भाजपा ने 23 सीटों पर जीत दर्ज की। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। इसके बाद 2008 और 2013 के चुनावों में भी संभाग की जनता ने भाजपा पर भरोसा जताया। 2008 में भाजपा को 18 व 2013 में 28 सीटें मिली। दोनों ही बार भाजपा ने सत्ता हासिल की। आंकड़ों को देखते हुए इस बार भी भाजपा सत्ता में काबिज रहने के लिए इन सीटों पर विशेष ध्यान दे रही है। वहीं, कांग्रेस भी सरकार की नाकामयाबियां बताकर जनता का विश्वास जीतने की कोशिश कर रही है।

भाजपा का गढ़ माना जाता है संभाग

उज्जैन संभाग को भाजपा का गढ़ माना जाता है। वर्तमान में यहां सात जिले हैं। उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, नीमच, शाजापुर, आगर और देवास। पिछले छह विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो वर्ष 1998 में ही भाजपा को कांग्रेस से टक्कर मिली है। इस चुनाव में कांग्रेस ने 22 सीटें जीती थीं। इसे छोड़ दें तो हर बार भाजपा आगे रही है।

कांग्रेस को 1998 के बाद नहीं मिला जनाधार

कांग्रेस को 1998 में संभाग में 22 सीटें मिली थीं। इसके बाद से ही कांग्रेस को जनाधार नहीं मिला है और तभी से कांग्रेस सत्ता से भी दूर है। कुछ माह पूर्व कांग्रेस की प्रदेशस्तरीय बैठक में संभाग की इन सीटों को लेकर चर्चा भी हुई थी। जिसमें नए चेहरों व युवाओं को टिकट देने की मांग कार्यकर्ताओं ने उठाई थी।

1993 के चुनाव अपवाद

वर्ष 1990 के चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला था। 220 सीटों पर जीत मिली थी। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। इसके बाद वर्ष 1993 में चुनाव हुए थे। इस चुनाव में संभाग की 29 सीटों में से 16 पर भाजपा जीती थी। इसके बाद भी भाजपा प्रदेश में सरकार नहीं बना पाई थी।

कांग्रेस ने तैयार की रणनीति, भाजपा बदलेगी चेहरा

संभाग की 29 सीटों पर कब्जा जमाने के लिए दोनों ही प्रमुख दलों ने कमर कस ली है। कांग्रेस ने जहां इसके लिए ठोस रणनीति व जनसंपर्क का प्लान तैयार किया है। वहीं, भाजपा ने भी मौजूदा विधायकों को लेकर गुप्त सर्वे करवाया है। सूत्रों की मानें तो कई स्थानों पर वर्तमान विधायकों को लेकर जनता में आक्रोश को देखते हुए भाजपा आलाकमान चेहरे बदलने पर विचार कर रहा है।