काश ये हिंदी में होता, आपको भी कभी ऐसा लगता है

राजधानी दिल्ली के एक होटल में बैठे सत्यपाल चंद्रा ने वेटर को हिंदी में ऑर्डर दिया तो वो उन पर हंसने लगा। यहां तक कि हिंदी बोलने पर वेटर ने उनका मजाक भी उड़ाया। सत्यपाल के साथ हुई इस घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। उन्हें लगा कि काश हमारे देश में हिंदी बोलने पर ऐसा व्यवहार नहीं होता, काश सभी चीजें हिंदी में होतीं।

इस घटना के बाद उन्होंने 6 महीने तक अंग्रेजी सीखी और उसी भाषा में 10 किताबें लिख दीं। इसमें से उनका एक नॉवेल ‘द मोस्ट एलिजिबल बेचलर’ बेस्ट सेलर बुक में शामिल रही। यह अकेले सत्यपाल की नहीं, हर उस शख्स की कहानी है, जो सिर्फ हिंदी बोलता और लिखता है।

सिर्फ हिंदी समझने वाले लोगों को कई बार ऐसा महसूस होता है काश यह चीज हिंदी में होती, तो वे उसे समझ लेते। हालत तो यह है कि शहरों के मॉल और बड़ी दुकानों के दरवाजे पर लिखे पुश (धकेलिए) और पुल (खींचे) को भी आम लोग समझ नहीं पाते।

सिर्फ अंग्रेजी नहीं जानने के कारण उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। ये उन कुछ बातों में से हैं जो लोगों को हिंदी को छोड़कर अंग्रेजी सीखने पर मजबूर करती हैं।

सत्यपाल चंद्रा

ऐसा ही एक वाकया इंदौर के जितेंद्र वर्मा के सामने हुआ जब वे पिज्जा खरीदने पहुंचे थे। वहां एक युवक ऑर्डर देने लगा तो उसे सेल्स गर्ल की अंग्रेजी में कही बात समझ नहीं आई। युवक ने पूछा कि आप क्या कह रही हैं, इस पर सेल्स गर्ल ने बड़े ही शर्मिंदा करने वाले अंदाज में उससे बात की। वहां बैठे कुछ लोग उसके अंग्रेजी नहीं बोल पाने का हंसकर मजाक भी उड़ा रहे थे। जितेंद्र कहते हैं – बड़ी दुकानों में हिंदी में ऑर्डर क्यों नहीं किया जा सकता, काउंटर पर रहने वाले भी तो हिंदुस्तानी हैं, उन्हें भी तो हिंदी आती है। फिर हिंदी बोलने वालों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जाता है। दुनिया में कई ऐसे देश हैं जो सिर्फ अपनी भाषा से ही आगे बढ़े हैं, फिर हमने क्यों अंग्रेजी को इस तरह अपना लिया है।

हिमांशु सोनी कपड़े खरीदने एक दुकान पर गए थे। वहां एक बुजुर्ग दंपती आए और गेट को खींचकर खोलने की कोशिश करने लगे, जबकि उस गेट पर अंग्रेजी में पुश (धकेलिए) लिखा था। इस पर दुकान के कर्मचारी उन्हें देखकर हंसने लगे और कहा कि गेट पर तो लिखा है कि इसे धकेलना है, लेकिन आप समझ नहीं पाए। यह दृश्य देख तो वहां मौजूद सभी लोग स्तब्ध हो गए।

हिमांशु का कहना है कि आजकल तो यह हाल है कि हिंदी के साथ अंग्रेजी के शब्दों को न मिलाकर केवल हिंदी बोलें तो लोगों का बात करने का नजरिया बदल जाता है। हिंदी का कोई शब्द लड़खड़ाकर बोलने और यह बताने पर कि मेरी हिंदी थोड़ी कमजोर है, कुछ लोगों को गर्व महसूस होता है। गलत अंग्रेजी बोलने पर तो टोका जाता है, लेकिन गलत हिंदी बोलने पर क्यों नहीं। अंग्रेजी में लिखे फॉर्म को भरने के लिए बैंकों और कॉलेजों में आज भी लोग बार-बार पूछते नजर आते हैं, इसमें क्या लिखना हैं।