कैसे लगेगी यूपी में कांग्रेस की नय्या पार, जब खेवइया है असमंजस में

चुनाव विशेषज्ञ प्रशांत किशोर उतर प्रदेश में कांग्रेस की साख को फिर से जमाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे है और उतर प्रदेश का चुनाव यकीनन कांग्रेस के लिए जीवन-मृत्यु के प्रश्न के समान है। 2007 में कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी ने उम्मीद जताई थी, लेकिन पार्टी 22 सीटों पर सिमट गई।

इसके बाद 2012 में राहुल गांधी ने फिर से पूरा दमखम लगाया और खींचतान कर कांग्रेस को 28 सीटें दिलाई। लेकिन 2014 के बाद से कांग्रेस की हालत बेहद दयनीय चल रही है। पहले केंद्र से सत्ता छीन गया और अब धीरे-धीरे राज्यों पर भी पकड़ ढीली होती दिख रही है। ऐसे में अब कांग्रेस की प्रतिष्ठा ही दाव पर लग गई है।

इसलिए कांग्रएस ने प्रशांत किशोर का दामन थामा है। वही किशोर जिन्होने पीएम नरेंद्र मोदी को पहले गुजरात में और फिर लोकसभा में और उसके बाद नीतीश कुमार को बिहार में जीतवाया। कांग्रेस को जीताने के लिए पूरे राज्य का दौरा कर रहे है। योजनाएं बना रहे है।

संगठन को वापस उसकी जगह पर लाने के लिए दिन-रात प्रयास कर रहे है, लेकिन सब बेकार जा रहा है। कांग्रेस के पास विधानसभा चुनावों के लिए कोई भरोसेमंद चेहरा तक नहीं है। न ही कोई जातीय समीकरण उसके पक्ष में हैं। दलितों को पहले ही बीएसपी अपने पाले में कर 4 बार सत्ता का स्वाद चख चुकी है, तो पिछड़ों और मुस्लिमों के समीकरण के साथ सपा ने सत्ता की सवारी की है।

बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के बाद से ही सवर्णो पर अपनी पकड़ बनाई हुई है। कांग्रेस के पास कोई तारणहार नहीं है। कार्यकर्ताओं की फौज प्रत्याशियों के पास इसलिए भी देखी जाएगी, क्योंकि समर्पित कांग्रेसियों की संख्या प्रदेश में नगण्य सी हो चली है। दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी प्रशांत से चिढ़े हुए है।

प्रशांत ऐसे नेताओं की नाराजगी को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। वो चाहते हैं कि चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले अपने क्षेत्र के हर बूथ से कार्यकर्ताओं का नाम दें, ताकि वो उसकी ताकत का अंदाजा लगा सके। यही नहीं, उन्होंने सभी नेताओं से आपसी लड़ाई और गुटबाजी से दूर रहने का भी फरमान जारी कर दिया है।

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