ग्वालियर में 107 साल पुरानी रामलीला : चार पीढ़ि‍यों से बनते आ रहे हैं राम

मुरार की रामलीला को 107 वर्ष पूरे हो गए हैं। जिस जगह रामलीला होती है उसे कंपनी बाग कहा जाता है लेकिन अब इसे लोग रामलीला मैदान के नाम से ही जानते हैं। इसमें अभिनय करने वाले कलाकार रामलीला करते नहीं बल्कि जीते हैं।

अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कलाकार अभिनय करने के लिए नौकरी से 30-30 दिन की छुट्टी लेकर आते हैं। जिसमें उन्हें पैसे मिलते नहीं बल्कि जेब से ही उल्टे लगाने पड़ते हैं। रामलीला की शुरुआत दीनदयाल धर्मशाला से हुई थी लेकिन दर्शक बढ़ने के साथ ही रामलीला का स्थान भी बदलता गया।

सन 1910 में दीनदयाल शर्मा ने अपने साथी लालाराम उपाध्याय, सुबोध मुखर्जी एवं तीन अन्य लोगों के साथ मिलकर रामलीला की शुरुआत दीनदयाल की धर्मशाला से की थी। दशहरे के अगले दिन से रामलीला शुरू होती है। इसकी विशेषता ये है कि इसमें रावण दहन नहीं बल्कि रावण वध होता है।

रामलीला के लिए स्टेट समय में सिंधिया परिवार की तरफ से आर्थिक मदद के साथ ही राम बारात के लिए हाथी एवं बग्घी भी उपलब्ध कराई जाती थी। हालांकि 25 साल से ये सहयोग मिलना बंद हो गया है। श्री रामलीला मंडल मुरार के अध्यक्ष बैजनाथ सिंह घुरैया ने बताया कि 107 साल बाद भी रामलीला का आकर्षण बरकरार है। दर्शक संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

रामलीला का विस्तार

दर्शक बढ़ने पर दीनदयाल की धर्मशाला जब छोटी पड़ने लगी तो इसे जैन धर्मशाला और फिर मुरार गंज में शिफ्ट किया गया। जब ये स्थान भी छोटा पड़ा तो सन 1967-68 में कंपनी बाग मैदान में रामलीला का मंचन शुरू हुआ।

माइक के सामने संवाद

छोटी धर्मशाला होने से पहले माइक की जरूरत नहीं महसूस हुई लेकिन मुरार गंज में जब रामलीला शुरू हुई तो एक स्टेज माइक लगाया जाने लगा। कलाकार संवाद बोलने माइक के सामने पहुंचते थे।

कलाकार बोलते हैं चौपाई

1910 में लालाराम उपाध्याय के द्वारा संस्कृत संवाद लिखे गए थे। इसी स्क्रिप्ट को पढ़कर कलाकार मंच पर अभिनय करते थे। 1973 तक इसमें बदलाव हुएए इसे सरल भाषा में लिखा गया। रामलीला मंचन के दौरान कलाकर खुद ही दोहा, चौपाई और सोरठा आदि बोलते हैं।

3 माह पहले प्रशिक्षण

रामलीला में अभिनय करने वाले ज्यादातर कलाकार पुराने ही होते हैंए जबकि कुछ नए भी शामिल होते हैं। इन सभी का प्रशिक्षण जुलाई से सितंबर माह तक चलता है। इस अवधि में कलाकारों को रामलीला करना नहीं जीना पड़ता है। जिससे हर संवाद उन्हें अच्छी तरह याद हो जाएं।

चंदे से होती है रामलीला

श्रीरामलीला मंडल मुरार के सदस्यों के अलावा प्रत्येक व्यापारी से चंदा एकत्र किया जाता है। जिसमें कमेटी के सदस्य ही नहीं कलाकार खुद भी चंदा एकत्रित करने सड़कों पर निकलते हैं। प्रतिवर्ष करीब 5.50 लाख का खर्च होता है।

चार पीढ़ियों से राम

लालाराम उपाध्याय के परिवार के सदस्य चार पीड़ियों से राम का किरदार निभाते आ रहे हैं। रामस्वरूप उपाध्याय के बाद भतीजे अवधेश उपाध्याय ने राम का अभिनय किया। इसके बाद उनके भाई अखिलेश उपाध्याय, फिर भतीजे राजेन्द्र उपाध्याय, उनके बेटे विकास उपाध्याय और अखिलेश के पुत्र विकास उपाध्याय ने भी राम का अभिनय किया। वर्तमान में राम के बचपन का रोल भतीजे अमन उपाध्याय और युवावस्था का किरदार नाती प्रशांत उपाध्याय निभा रहे हैं।

बुलंद आवाज पहचान

रामलीला की शुरुआत में रावण का किरदार रामचंद्र खलीफा निभाते थे। उनकी आवाज इतनी बुलंद थी कि बच्चे डर जाते थे। वर्तमान में कुलदीप इस किरदार को निभा रहे हैं। 12 साल में उनका किरदार उनकी पहचान बन चुकी है जबकि सीता का किरदार पिछले 5 साल से लक्की उर्फ रोनित पाठक निभा रहे हैं।

अभिनय के लिए नौकरी से अवकाश

दशरथ – 63 वर्षीय अखिलेश उपाध्याय रामलीला में लगभग हर किरदार निभा चुके हैं। वर्तमान में वे दशरथ का रोल करते हैं। वे गल्ला कारोबारी है।

बाली – एसएएफ में सर्विस करने वाले दयासागर शर्मा (34) पिछले कई सालों से बाली एवं मेघनाद का किरदार निभा रहे हैं। वे रामलीला के लिए 30 दिन की छुट्टी लेकर आते हैं।

रावण – कुलदीप कौरव (32) पिछले 12 साल से रावण का किरदार निभा रहे हैं। वे जेबी मंघाराम फैक्ट्री में शिफ्ट इंचार्ज हैं।

भोलेनाथ – दवा विक्रेता विनोद माथुर (62) 30 साल से यह किरदार निभा रहे हैं। इससे पहले उनके पिता रामलीला में भोलेनाथ का रोल करते थे। रामलीला शुरू होने के बाद वह दुकान पर सुबह की शिफ्ट में बैठते हैं जबकि रात को रामलीला में भाग लेते हैं।

विश्वामित्र – प्रणय प्रकाश शर्मा मुरार रामलीला मंडल में असिस्टेंट डायरेक्टर भी हैं। वह रामलीला के लिए स्कूल से अवकाश लेते हैं।

इनके अलावा शशांक दीक्षित (हनुमान) निरंजन सिंह गुर्जर (सुग्रीव), विकास उपाध्याय (अंगद), प्रवीण दीक्षित (विष्णु), दुर्गेश पाठक (परशुराम), कौशल शर्मा (लक्ष्मण), अमन पांडे (भरत), चंद्रवेश कटोर (शत्रुघ्न) के किरदार निभाते हैं।