जिनके बारुद से बेटे और पोते को खोया, उन्हीं के यहां कर रहे नौकरी

पटाखा दुकानों या फैक्टरी में आग लगने से इस साल अप्रैल व जून में इंदौर, बालाघाट और दतिया में तीन हादसे हुए। इनमें 39 लोगों की मौत हो गई। पटाखों ने यहां काम करने वाले या खरीदारी करने आए मासूम लोगों के घरों में कैसे जिंदगीभर के लिए अंधेरा कर दिया, यह जानिए इन तीन परिवारों के दास्तां से-

जिनके बारूद से बेटे और पोते को खोया, परिवार पालने के लिए उनके ही गोदाम की चौकीदारी कर रहे हैं धन्नालाल

हातोद से अरुण जैन

इंदौर के रानीपुरा हादसे में बेटे और पोते को खो चुके धन्नालाल बोडाना की बदकिस्मती देखिए कि 75 साल की उम्र में उन्हें बेटे और पोते का परिवार पालने के लिए उसी मालिक के गोदाम में काम करना पड़ रहा है, जिसकी दुकान में रखे पटाखों से दोनों की जान चली गई।

हातोद में रह रहे धन्नालाल का परिवार तीन पीढ़ी से पटाखों के काम से जुड़ा हुआ है। वे खुद हातोद में बने गोदाम की चौकीदारी करते हैं, जबकि बेटा और पोता रानीपुरा में गुरविंदर सिंह की दिलीप पटाखा दुकान में काम करते थे। 19 अप्रैल को दुकान में आग लगने से 50 वर्षीय करन और 35 वर्षीय चेतन की मौत हो गई थी।

दो कमाऊ हाथ गंवाने के बाद अब इस परिवार की दो विधवा बहुओं और चेतन के तीन बच्चों को पालने की जिम्मेदारी धन्नालाल पर है। वे कहते हैं दो-दो लाख रुपए का जो मुआवजा मिला था, उससे घर पक्का कर लिया, ताकि पक्की दीवारों के पीछे महिलाएं तो महफूज रहें। बाकी घर का चूल्हा जलाने के लिए ये बूढ़ी हड्डियां अभी बाकी हैं।

पटाखों के साथ घर की छत और कारोबार भी उड़ गया

हाटपीपल्या से नरेंद्र ठाकुर


हाट-बाजार में जूते-चप्पलों की दुकान लगाने वाले हाटपीपल्या के जगदीश सोलंकी 19 अप्रैल के दिन रानीपुरा में खरीदी करने आए थे। जिस दुकान से वे जूते-चप्पल खरीद रहे थे, उसके पास ही दिलीप पटाखा दुकान में आग लग गई। इसमें जलकर उनकी मौत हो गई थी। पत्नी सीताबाई कहती हैं जब तक पति थे, अपनी छत थी, कारोबार था पर अब सब कुछ दूसरों के आसरे है। दो लाख रुपए मुआवजा तो मिल गया, लेकिन उससे पूरी जिंदगी कैसे चलेगी।

मानसिक रूप से विक्षिप्त 27 साल की बेटी के इलाज में ही हर महीने हजारों की दवाई लेना पड़ती है। फिलहाल जगदीश के भाई नेमीचंद सोलंकी ने पूरे परिवार को सहारा दिया है, लेकिन घर का खर्चा उठाने के लिए 25 साल के राहुल और 22 साल के महेंद्र को दूसरों की दुकान पर काम करना पड़ रहा है, क्योंकि खुद की दुकान लगाने जितनी पूंजी उनके पास नहीं है।

अब किसी को कोई फिक्र नहीं कि हम जिंदा हैं या मर गए

इंदौर से रुमनी घोष


12/2, लोधीपुरा में रहने वाली प्रमिला की शिकायत कितनी वाजिब है, वह उसके घर पहुंचे बगैर नहीं समझा जा सकता है। रानीपुरा के हादसे में इसी घर में रहने वाले दिलीप पटाखा दुकान के अकाउंटेंट सुरेश शर्मा की मौत हो गई थी। अब यहां पत्नी प्रमिला और मानसिक रूप से विक्षिप्त बेटा दीपक है। प्रमिला बताती हैं जब हादसा हुआ था, तब नेता-अफसर, मीडिया सब आए थे, लेकिन अब कोई पूछने नहीं आया कि हमारे घर में चूल्हा जल रहा है या नहीं। झाड़ू-पोंछा करके बेटे को दो-तीन हजार मिल जाते हैं। उससे किसी तरह किराया भरते हैं। बाकी आसपास वालों से मांगकर गुजारा कर रहे हैं। नगर निगम, कलेक्टोरेट सब जगह गुहार लगाई, कहीं से कोई मदद नहीं मिली।

…और यह सरकारी व्यवस्था

सागर से फॉरेंसिक रिपोर्ट ही नहीं आई

रानीपुरा अग्निकांड को इस दीपावली पर पूरे छह महीने हो जाएंगे लेकिन फॉरेंसिक जांच के लिए सागर भेजे गए सैंपल की रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है। जांच अध्ािकारी लक्ष्मण सिंह कहते हैं रिपोर्ट आएगी, तब तो चालान पेश कर पाएंगे।

नहीं मिल रही जर्जर भवन तोड़ने की अनुमति

पटाखा विस्फोट के बाद ही पुलिस ने इस भवन को जर्जर बताते हुए नगर निगम को तोड़ने के लिए पत्र लिखा था, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। निगमायुक्त का कहना है कलेक्टर से अनुमति के बाद ही इसे तोड़ा जा सकता है।

जनहित याचिका पर सुनवाई जारी

पटाखा दुकान में मारे गए लोगों (मालिक को छोड़कर) की कोई गलती नहीं थी, इसका हवाला देते हुए एडवोकेट मोहनसिंह चंदेल ने हाई कोर्ट से मृतकों को एक-एक करोड़ का मुआवजा दिए जाने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। सरकार ने जवाब दिया दो-दो लाख रुपए मुआवजा और दोषी अधिकारियों का तबादला कर दिया है। सुनवाई जारी है।

इनका कहना है

रानीपुरा गोदाम काे तोड़ने से संबंधित फाइल नगर निगम द्वारा मेरे पास नहीं आई है। फाइल आएगी तो इस पर निर्णय लिया जाएगा।

निशांत वरवड़े, कलेक्टर