दवे के निधन से अनाथ हुआ भोपाल का ‘नदी का घर’

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे के निधन से भोपाल के शिवाजी नगर स्थित नदी का घर अब अनाथ हो गया है। दवे का निजी जीवन हो या सार्वजनिक सब जगह पर्यावरण प्रेम ही झलकता था। उन्होंने भोपाल स्थित अपने मकान का ही नदी का घर रखा हुआ था। अब उनके निधन से नदी का यह घर अनाथ हो गया है। दवे का जन्म महाकाल की नगरी उज्जैन के वडनगर में 9 जुलाई 1956 को हुआ था। 61 वर्ष की आयु में 18 मई 2017 को देश का पर्यावरण मंत्री रहते हुए ही उनका निधन हुआ है। उनके पर्यावरण प्रेम को देखते हुए ही पिछले साल कैबिनेट के विस्तार में पीएम मोदी ने उन्हें सरकार में शामिल करते हुए पर्यावरण मंत्री बनाया था।
वंशानुगत रहा है दवे का पर्यावरण प्रेम
पर्यावरण से जुडकर जीने वाले और पर्यावरण की चिंता के साथ मरे दवे का पर्यावरण प्रेम वंशानुगत रहा है। उनके पिता वन विभाग में कार्यरत थे। उनका भी निधन दवे की तरह असमय ही हुआ था। वे बेहद लो प्रोफाईल रहने वाले व्यक्ति थे। दवे अभी छोटे ही थे की उनके पिता का हृदयघात के वजह से निधन हो गया था। दवे के दादा, दादा साहब दवे का मध्यप्रदेश में बडा सम्मान था। संघ परिवार में उनकी बहुत इज्जत थी। यही वजह है कि दादा साहब दवे को संघ ने मध्य भारत प्रांत का पहला संघ चालक बनाया।
नर्मदा को सम्मान दिलाने के संघर्ष की शुरूआत दवे ने ही की
गंगा की तरह मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी कही जाने वाली नर्मदा नदी के सम्मान की राजनीतिक और सामाजिक लडाई की शुरूआत सबसे पहले अनिल माधव दवे ने ही की। नर्मदा समग्र नामक संगठन बनाकर वे नर्मदा की स्वच्छता और उसके पवित्रता को पहचान देने के लिए प्रयास करते रहे।

हौशंगाबाद के बांद्रा भवन में नर्मदा नदी के किनारे उन्होंने अपना एक आश्रम बना रखा था जहां से नर्मदा और पर्यावरण सुरक्षा के प्रयासों की रूपरेखा तैयार होती थी। नर्मदा के किनारे उन्होंने देश—विदेश से लोगों को बुलाकर अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव के आयोजन की शुरूआत की। बीते वर्ष उज्जैन कुंभ् में हुए ज्ञान संगम के भी वही प्रमुख कर्ताधर्ता थे।

आधुनिकता के साथ पर्यावरण का संतुलन
दवे का जोर आधुनिकता के साथ पर्यावरण के संतुलन पर रहा। पर्यावरण के उपर उन्होंने चिंतन भरे कई पुस्तकें लिखी हैं। तो पायलट का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने नर्मदा नदी के उदगम स्थल से लेकर उसके समुद्र में मिलने तक के सफर का खुद हवाई जहाज उडाकर 18 दिन की यात्रा की।

पर्यावरण के अलावा राजनीति के कुशल रणनीतिकार भी थे दवे
अनिल माधव दवे पर्यावरण प्रेम के अलावा राजनीति के कुशल रणनीतिकार भी थे। खुद उन्होंने जनता के बीच कोई सीधा चुनाव नहीं लडा। मगर 2003 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह सरीखे कांग्रेस के दिग्गज नेता को सत्ता से उखाड फेंकने में उनके रणनीति की भूमिका बेहद अहम रही थी। तब से वे मध्यप्रदेश के सभी चुनावों में भाजपा की ओर से मुख्य रणनीतिकार की भूमिका में रहे।

दिग्विजय को दी थी मिस्टर बंटाधार की संज्ञा
2003 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में सबसे दिग्विजय सिंह के खिलाफ सबसे चर्चित रहे नारे मिस्टर बंटाधार को दवे ने ही गढा था। उस वक्त दवे उमा भारती के बेहद करीबी हुआ करते थे।

शिवाजी थे दवे के आदर्श
दवे के आदर्श छत्रपति शिवाजी थे। उन्होंने शिवाजी के प्रशासन और रणनीति का गहन अध्ययन किया है। उनका मानना था कि शिवाजी का प्रशासन बेहद आदर्श था उसे अमल में लाकर भारत को सर्वश्रेष्ठ बनाया जा सकता है। उनपर शिवाजी के गहरे प्रभाव का ही असर रहा कि 2003 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए भोपाल में गौरी शंकर शेजवार के ​सरकारी आवास पर बने चुनावी वार रूम का नाम जावली रखा था। इसी जावली से वे दिग्विजय सिंह को मात देने की रणनीति बनाते रहे। शिवाजी के शासन में प्रशासनिक और रणनीति वाले इकाई का नाम जावली हुआ करता था।

उमा ने दी दवे को राजनीतिक पहचान
पर्यावरण के इस प्रेमी को राजनीति में पहचान मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने दिलाई थी। 2003 के चुनाव में दवे की रणनीति की कायल उमा ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें अपना राजनीतिक सलाहकार बनाया था। चंद वर्षों के बाद दवे की उमा से दूरी बन गई लेकिन वे तब से मध्यप्रदेश की राजनीति में एक धूरी बनकर रहे। प्रदेश भाजपा संगठन में महामंत्री से लेकर तमाम भूमिका में रहने के बाद वे राज्यसभा के सांसद बने और अब मंत्री रहे।वे वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भी बेहद करीबी रहे। पीएम मोदी का भी उनसे विशेष स्नेह रहा है।

सुरेश सोनी के प्रिय पात्रों में रहे शूमार
शिक्षा—दिक्षा पूरी करने के बाद दवे संघ के प्रचारक बन गए थे। भोपाल में बतौर विभाग प्रचारक उन्होंने लंबे समय से संघ का कार्य किया। उसके बाद भाजपा की राजनीति में सक्रिय हुए। संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी के प्रिय पात्रों में उन्हें शूमार माना जाता है।

गुजराती भाषा के भी रहे जानकार
दवे की स्कूली शिक्षा गुजरात में हुई है। जिसके वजह से गुजराती भाषा का उन्हें बेहद बढिया ज्ञान रहा है। उन्होंने स्नातक और एम कॉम की शिक्षा भी इंदौर के गुजराती कॉलेज से पूरी की। पीएम मोदी के साथ उनके बेहत्तर रिश्ते बनने में उनके गुजराती भाषा के ज्ञान को भी एक अहम कारण माना जाता है।

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