नवंबर में बड़े आंदोलन की तैयारी में पंचायत प्रतिनिधि और किसान

पंचायत प्रतिनिधि एक बार फिर अपने अधिकारों को लेकर लामबंद होने लगे हैें। इस बार किसानों को साथ लेकर आंदोलन की रणनीति बनाई गई है। नवंबर में इसकी शुरुआत मंदसौर और रतलाम से हो सकती है। 15 अक्टूबर तक इसकी रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा। वहीं, दो अक्टूबर गांधी जयंती को सभी जिला मुख्यालयों पर सरकार की वादाखिलाफी के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।

पंचायत और किसान आंदोलन से जुड़े त्रिस्तरीय पंचायतराज संगठन के संयोजक डीपी धाकड़ ने बताया कि सरकार ने न तो पंचायत प्रतिनिधियों की मांगों को पूरा किया है और न ही किसानों की। इसको लेकर दोनों में काफी नाराजगी है। सरकार पर पंचायतराज अधिनियम में दिए पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों को वापस लौटने के लिए दबाव बनाया जाएगा।

धाकड़ ने बताया कि खरीफ की फसल बर्बाद होने से किसान आर्थिक मुसीबत में फंस गया है। पिछले दो-तीन साल से फसलें खराब आ रही हैं। लागत बढ़ने के कारण खेती लाभ का धंधा नहीं रह गई है। फसल खराब होने से कर्ज में घिरे कुछ किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

डिफॉल्टर होने से सहकारी समितियां भी ऋण नहीं दे रही हैं। ऐसी सूरत में कर्जमाफी ही एकमात्र विकल्प है, जो किसान को कुछ राहत दे सकता है। आंदोलन कर सरकार पर कर्जमाफी के लिए दबाव बनाया जाएगा। इसकी मांग सोमवार को गांधी जयंती पर जिला मुख्यालय में पांच घंटे शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन कर की जाएगी।

अण्णा हजारे को बुलाने की कोशिश

पंचायतराज संगठन के पदाधिकारी आंदोलन को धार देने के लिए अण्णा हजारे को बुलाने की कोशिश भी कर रहे हैं। इसके लिए रालेगण सिद्धी जाकर उनसे मुलाकात भी कर चुके हैं। बताया जा रहा है कि नवंबर में यदि वे तारीख देने के लिए राजी हो जाते हैं तो संगठन आंदोलन की घोषणा कर देगा।

नहीं हो रही सुनवाई

पंचायतराज संगठन के पदाधिकारियों का आरोप है कि सरकार में उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने भी यह बात उठ चुकी है। जिला पंचायत अध्यक्षों का कहना है कि उनके पास कोई अधिकार ही नहीं रह गए हैं। प्रशासन उनके पास फाइलें ही नहीं भेजता है।

दो करोड़ रुपए की एकमुश्त राशि तो दी गई है पर उपयोगिता प्रमाण-पत्र जिला अधिकारियों द्वारा नहीं दिए जाने से आगामी किस्त रोक दी गई है। पिछले दिनों शहडोल जिला पंचायत अध्यक्ष नरेंद्र सिंह मरावी जिला अधिकारियों के भ्रष्टाचार और तानाशाहीपूर्ण रवैए से नाराज होकर धरने पर बैठ गए थे।