पूर्व आतंकी भी सरपंच बनने के लिए मैदान में उतरा

जम्मू। राज्य में अलगाववादियों द्वारा चुनावों में भाग लेने पर मौत के घाट उतारने के फरमान के चलते बेशक वादी में पंच-सरपंच चुनने वालों में अधिकांश जगह जोश नजर नहीं आया हो। मगर, जिला बडगाम के सुखनाग ब्लॉक में खूब मतदान हुआ। कारण, आतंकियों की बंदूक को लोकतंत्र की ताकत का अहसास कराने के लिए एक पूर्व आतंकी भी सरपंच बनने के लिए मैदान में डटा हुआ था।

सुखनाग के राखी-वाचू गांव का रहने वाला गुलाम मोहिउद्दीन वानी बेशक अब बूढ़ा हो गया है। दाढ़ी और सिर के बालों की सफेदी उसकी ढलती उमर का एलान कर रही है। मगर, 1990 के दशक में खूंखार आतंकियों की श्रेणी में शामिल रहे मोहउद्दीन का जोश जवानों को हरा रहा था। उसने बंदूक की असलियत समझ आने पर सुरक्षाबलों के आगे हथियार डाले थे।

सुखनाग ब्लॉक में सड़क किनारे स्थित सरकारी मिडिल स्कूल में बने मतदान केंद्र सात से कुछ दूरी पर वह अकेला खड़ा होकर मतदान करने वालों को बड़ी ध्यान से देख रहा था। वहां मतदाताओं की भारी भीड़ लगी थी और लोग अपने उम्मीदवार की हार-जीत के गणित पर बात कर रहे थे। बीच में कई लोग आकर उससे सलाम दुआ भी कर रहे थे और वह सभी से हंसकर बात करते हुए पूछ रहा था कि वे क्या सोचते हैं।

हालांकि, मतदाता वोट डालने के बाद किसी बाहरी व्यक्ति विशेषकर मीडियाकर्मियों से बातचीत करने से बच रहे थे। मगर, वह बिना डरे ही बोला- मैं मौत से नहीं डरता। मैंने बंदूक उठाई थी, निजाम बदलने के लिए। मैं पंचायत चुनावों में हिस्सा ले रहां हूं, कश्मीर में निजाम बदलने के लिए। यहां जम्हूरियत को मजबूत बनाने और अपने इलाके में तरक्की और खुशहाली का जरिया बनने के लिए। मुझे आतंकियों से डर नहीं लगता। मैं यहां सिर्फ सरपंच बनने के लिए चुनाव नहीं लड़ रहा हूं। मैं जम्हूरियत में दिल से यकीन रखता हूं।

चुनाव बहिष्कार के विभिन्न राजनीतिक दलों के एलान को ड्रामा करार देते हुए गुलाम मोहिउददीन ने कहा कि असलियत यहां लोग जानते हैं। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी एक ही हैं। हुर्रियत नेताओं के बारे में भी लोग दबे मुंह कई तरह की बातें करते हैं। इन सभी ने कश्मीरियों को धोखा देकर अपने घर भरे हैं।