पढ़ाई छोड़ने वाले आधे बच्चों को नहीं लौटा पाये स्कूल

स्कूलों में एक बार फिर ‘स्कूल आ पढ़े बर, जिनगी ला गढ़े बर स्लोगन गूंजेगा। यह स्लोगन उन बच्चों के लिए है जो पढ़ाई से दूर हैं। सरकारी तामझाम के बाद स्कूलों में बच्चों को अफसर ला रहे हैं, लेकिन स्कूल छोड़ने वालों के लिए करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी आधे को ही लौट पाये हैं।

साल 2011 से अब तक के आंकड़ों को देखें तों हर साल बच्चों को स्कूल में वापस लाने की योजना फेल रही है। ऐसा कोई भी साल नहीं रहा जब शत-प्रतिशत बच्चों को वापस लाया गया हो। ये वे बच्चे हैं जिनका नाम सरकारी स्कूलों में लिखवाया गया, लेकिन पढ़ाई के लिए बेहतर वातावरण नहीं मिलने के कारण बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया। इस साल फिर कोटवारों, सेवानिवृत शिक्षकों, प्रेरकों और शिक्षकों को छूटे बच्चों को स्कूल तक लाने की जिम्मेदारी दी गई है।

स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के लिए भारत सरकार की तमाम योजनाएं हैं। केंद्र सरकार की ओर से सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत बच्चों के लिए नाइट सेल्टर योजना चलती थी, जो फिलहाल बंद है। इसके बाद सीजनल हॉस्टल, रेसीडेंशियल हॉस्टल संचालित हैं। वर्तमान में पलायन प्रभावित छह जिलों में 50 सीट 16 डॉरमेट्री चल रही हैं। इसके तहत बलौदाबाजार, धमतरी, जांजगीर चांपा, कबीरधाम, महासमुंद, रायगढ़ जिलों में इस साल अफसरों ने 62 लाख स्र्पये खर्च करने के लिए भेजा और बाद में कई जिलों से रकम भी वापस कर ली।

स्कूल छोड़ने वाले बच्चों पर खर्च –

मार्च 2015 – 13 करोड़ 43 लाख स्र्पये

अगस्त 2015 – 10 करोड़ 57 लाख स्र्पये

दिसम्बर 2015 – 02 करोड़ स्र्पये मात्र

मई 2016 – 02 करोड़ 41 लाख 5 हजार स्र्पये

अगस्त 2016 – 01 करोड़ 92 लाख 50 हजार स्र्पये

जनवरी 2017 – 20 लाख स्र्पये मात्र खर्च

मार्च 2017 – 21 लाख 44 हजार 500 स्र्पये

फरवरी 2018 – 62 लाख स्र्पये मात्र स्वीकृत