फूलवती के मुकदमे ने कैसे खोला ‘तीन तलाक़’ का पिटारा?

11 मई से सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच मुसलमानों में ट्रिपल तलाक़, हलाला और एक से अधिक शादी करने के मुद्दे पर सुनवाई जारी है.
आइए, इस मामले को पूरी तफ़सील से समझते हैं. इस मामले की शुरुआत होती है अक्तूबर 2015 से.
अक्तूबर 2015: कर्नाटक की एक महिला फूलवती हिंदू उत्तराधिकार क़ानून के तहत पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची.
प्रकाश एंड अदर्स वर्सेस फूलवती एंड अदर्स केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू सक्सेशन क़ानून को लेकर कुछ टिप्पणी की.
सुनवाई के दौरान प्रकाश के वकील ने कहा कि हिंदू क़ानून में कमियों की बात तो हो रही है, लेकिन मुस्लिम पर्सलन लॉ में तो बहुत सारे ऐसे प्रावधान हैं जो सीधे-सीधे मुस्लिम महिलाओं के ख़िलाफ़ हैं.
ये सुनते ही सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अनिल दवे और जस्टिस एके गोयल ने स्वत: संज्ञान लेते हुए एक पीआईएल दायर करने का फ़ैसला सुना दिया
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया और उसे अपना पक्ष रखने को कहा.
इसी दौरान उत्तराखंड की एक मुस्लिम महिला शायरा बानो को उनके पति ने ट्रिपल तलाक़ यानी एकतरफ़ा एक साथ तीन तलाक़ दे दिया.
फ़रवरी 2016: शायरा बानो ने फ़रवरी 2016 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और अदालत से गुहार लगाई कि ट्रिपल तलाक़ को असंवैधानिक क़रार दिया जाए
शायरा बानो के बाद आफ़रीन रहमान और नीलोफ़र समेत चार और महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ इंसाफ़ की गुहार लगाई.
इसी दौरान मुसलमानों की एक धार्मिक और सामाजिक संस्था जमीअत-उलेमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी कि मुसलमानों के पर्सनल मामले से जुड़े किसी मामले में कोई भी फ़ैसला करने से पहले सुप्रीम कोर्ट उनकी भी बात ज़रूर सुने.
जमीअत के अलावा मुसलमानों के पर्सनल लॉ की हिफ़ाज़त करने के लिए बनी संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि उन्हें भी सुना जाए.
एक तरफ़ जहां मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं अदालत पहुंची, तो शायरा बानो के समर्थन में कुछ महिला संगठन भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए.
उनमें भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन और बेबाक कलेक्टिव शामिल हैं.

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