बाघ बदल रहे है , आवासीय क्षेत्रो में आ रहे है नजर…

जंगलो की कमी के चलते और अवेध्य तरीके से पेड़ काटने के कारण बाघ अपना इलाका छोड़ आवासीय क्षेत्रो में एक बार फिर नजर आने लगे है | जिससे लोगो के मन में चिंता बढ़ गयी है | साथ ही छोटे बच्चो की जान बचाने का खतरा भी बना हुआ है  प्रदेश में बाघ और तेंदुए अपना नया इलाका बना रहे हैं। इसके लिए उन्हें जगह भी बदलना पड़ रही है। जहां पहले कभी बाघ की मौजूदगी नहीं देखी गई, वहां अब उसकी उपस्थिति के संकेत मिल रहे हैं। झाबुआ, रतलाम, बड़नगर (उज्जैन) में बाघ दिखाई देना इस ओर इशारा करते हैं। वहीं राजधानी से सटे ईंटखेड़ी में भी बाघिन की मौजूदगी ने करोंद क्षेत्र में भय का वातावरण बना दिया है।जंगलों में खाना और पानी कम होने के कारण बाघ व तेंदुए अपना रास्ता बदल रहे हैं। अब उन इलाकों में भी इन प्राणियों को देखा जा रहा है, जहां पहले कभी नहीं देखा गया। वन्यप्राणी विशेषज्ञ इसे सरकार की कमजोरी बता रहे हैं। वे कहते हैं कि संरक्षित और सामान्य वन क्षेत्रों में खाने और पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो जाए तो जानवर दूसरी जगह नहीं जाता है।
शहरीकरण के कारण नजर आने लगे जानवर

शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। जंगल खत्म हो रहे हैं। लोगों को जहां जगह दिखती है वहां रहवासी क्षेत्र बन जाता है। बताते हैं कि बाघों का मूवमेंट नई बात नहीं है। वे पहले भी इन्हीं इलाकों से आते-जाते रहे हैं, लेकिन पहले घना जंगल हुआ करता था। नदी-नालों में पानी होता था, जिनके सहारे बाघ पांच सौ किमी या इससे भी ज्यादा का सफर बगैर किसी को दिखे पूरा कर लेते थे। हालांकि वे इस बात से भी इंकार नहीं करते हैं कि जंगलों में बाघों-तेंदुओं के लिए पर्याप्त खाना-पानी नहीं रहा है।

इन इलाकों में नजर आ रहे:

उज्जैन के बड़नगर, रतलाम, झाबुआ, भोपाल के नजदीक ईंटखेड़ी में बाघ-बाघिन, शावक और भोजपुर एवं अशोकनगर में तेंदुओं की दस्तक देखी जा रही है। भोजपुर में शिव मंदिर के नजदीक तेंदुए का शावक मिला था, जबकि उसकी मां का अब तक पता नहीं चला है