मजदूरी कर घर लौटने पर अलाप लगाती थी तो लोग कहते थे पगली, पढ़ें इस फोक सिंगर की स्टाेरी

बिलासपुर. भरथरी की प्रख्यात गायिका सुरुजबाई खांडे का शनिवार को सुबह हृदयाघात से निधन हो गया। 69 साल की सुरुज बाई ने सोवियत रूस समेत कई देशों और भारत के अधिकांश राज्यों में दशकों तक भरथरी की प्रस्तुतियां दीं। वे 1986-87 में सोवियत रूस में हुए भारत महोत्सव का हिस्सा बनीं थीं। उनके निधन से बिलासपुर समेत पूरे प्रदेश के लोककलाकारों में शोक की लहर है। उनका अंतिम संस्कार शनिवार को सरकंडा में किया गयाउनकी सबसे बड़ी चिंता उनके साथ ही चली गई। वह ये कि उनके बाद भरथरी को आगे कौन बढ़ाएगा? महिला दिवस पर दैनिक भास्कर से सुरुज बाई ने जो कहा- पढ़िए उन्हीं की जुबानी।

मजदूरी कर घर लौटने के बाद जब अलाप लगाती थी तो लोग पगली कहते थे

सुरुजबाई ने बताया, “महज 11 साल की उम्र में शादी के बाद सुरुज बाई पौंसरी-सरगांव से ससुराल कछार आ गईं। दो बेटे हुए। दवा-पानी के अभाव में उनकी असमय ही मौत हो गई। मजदूरी की तलाश में पति लखन के साथ बिलासपुर आ गईं। पति भी भरथरी के अभ्यास में उनका पूरा साथ देते थे, लेकिन दोनों के पास अवसर और पैसों की कमी थी। दोनों रोज मालधक्का जाते थे। वहां बड़ी-बड़ी नमक-गेहूं की बोरियां, तेल के पीपे उठाते थे और ठेले खींचते थे। शाम को सुरुज बाई थकी-हारी घर पहुंचती थीं, तब पूरे आलाप में भरथरी गाना शुरू कर देतीं। परेशान मोहल्लेवाले उसे ‘पगली’ कहने लगे थे।”

क्या हैं भरथरी?

सुरुजबाई ने बताया, “मेरे नाना रामसाय धृतलहरे गांवों में भरथरी गाते थे। उन्होंने ही मुझे भरथरी सिखाया। फिर ढोला-मारु, चंदैनी और आल्हा उदल गाने लगी। भरथरी राजा विक्रमादित्य के भाई, उज्जैन के राजा थे। यह दुखों की कथा है।”

अंतिम दिनों में भी रोजाना ठीक वैसे ही सजती थीं, जैसे उन्हें किसी मंच पर भरथरी पेश करने जाना हो

बिलासपुर से लगे गांव बहतराई के एक मामूली से मकान में रहने वाली सुरुज बाई अपने अंतिम दिनों में भी रोजाना ठीक वैसे ही सजती थीं, जैसे उन्हें किसी मंच पर भरथरी पेश करने जाना हो। पुतरी, बहुंटा, नागमोरी, चुरी, पटा, करधन, बछिया और तोड़ा-पैरी समेत तमाम छत्तीसगढ़ आभूषणों से लदी रहती थीं।

चाय-पानी पिलाने की नौकरी तो मिली पर कला मर गई

सुरुजबाई को विदेश जाने तक का मौका मिला, लेकिन उनके मुताबिक बिलासपुर और छत्तीसगढ़ में कलाकारों का सम्मान नहीं है। यहां तो बुलाकर भी रुपए नहीं देते। शहर के लोक कलाकार जवाहर बघेल ने पहली बार मंच दिलवाया। 1985 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मंत्री बीआर यादव ने प्रचार का जिम्मा दिया और इसके एवज में उन्हें कुछ पैसे भी मिले। बाद में पूर्व मंत्री की सिफारिश पर ही उन्हें एसईसीएल में नौकरी मिली। सुरूजबाई के मुताबिक, “एसईसीएल ने मुझे चाय-पानी पिलाने की नौकरी दी, लेकिन कार्यक्रम में जाने के लिए मुझे छुट्टी नहीं मिलती थी। खाना-पीना हराम हो गया था। कहते थे चाय बनाओ, पानी लाओ, डाक बांटो। बाहर से आने वाले कार्यक्रमों के आमंत्रण की जानकारी नहीं देते। पत्र फाड़कर फेंक देते थे। यह सब इसलिए कि छुट्टी न देनी पड़े। रोजी-रोटी तो दी, लेकिन कला को मार दिया।” कुछ साल पहले एक हादसे में घायल हुईं तो उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया।

दुख ही दुख है जीवन में

इस लोक गायिका ने बताया, “मेरे जीवन में दुख ही दुख है। मेरे अपने दो बेटे थे। पति ने दूसरी शादी की। वे मोपका में रहते हैं। मैं यहां अकेले रहती हूं। अकेले जिंदगी काटना बहुत मुश्किल है। बेटों को याद कर रोती हूं। जब तक मां-बाप जिंदा थे, अलग बात थी। अब खाने-पीने की भी समस्या है। और लोगों को भरथरी सिखाकर क्या करूंगी। मैं तो बुजुर्ग हो गई। किसी तरह जी रही हूं।”

मेरे मरने के बाद कोई भरथरी गाने वाला नहीं रहेगा

शादी के बाद बिलासपुर आई और कुदुदंड में रहने लगी। शुरुआत में इप्टा ने एक कार्यक्रम में मौका दिया, जिसमें सत्यजीत रे और अभिनेता एके हंगल आए थे। तब एक कार्यक्रम के छह आने मिलते थे। उनके मुताबिक, “आज गायकों को गाते सुनती हूं तो दुख लगता है। लगता है मेरे मरने के बाद कोई भरथरी गाने वाला नहीं रहेगा। अब तक गायक शराब पीकर ददरिया और करमा गाते हैं। भिलाई की कुमारी वंदना और भोपाल में द्वारिका को मैंने भरथरी सिखाई, लेकिन अब वे गा रहे हैं या नहीं, यह नहीं पता।