महाराष्ट्र: एनसीपी नेता धनंजय मुंडे की संपत्ति जब्त करने का कोर्ट ने दिया आदेश

बीड जिला और सत्र अदालत ने महाराष्ट्र राज्य विधान परिषद के विरोधी पक्ष नेता धनंजय मुंडे का घर और 4 अन्य प्रॉपर्टी अटैचमेंट के आदेश दिए हैं. धनंजय मुंडे के अलावा 6 डायरेक्टर की प्रॉपर्टी अटैचमेंट आदेश दिए गए हैं.

धनंजय मुंडे से ‘आजतक’ की टीम ने नांदेड़ हवाई अड्डे पर बात की. उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ ये बड़ा षड्यंत्र रचा जा रहा है. धनंजय मुंडे ने कहा कि सहकार कानून के तहत ये कार्रवाई नहीं हुई.

उन्होंने बताया कि संत जगमित्र सुतगिरणी के 18 डायरेक्टर में से सिर्फ 7 डायरेक्टर के खिलाफ ऐसा आदेश आना ये एक चौंकाने वाली बात है. ये एक राजनीतिक स्वार्थ का नतीजा है. धनंजय मुंडे ने कहा के इस निर्णय के खिलाफ वो बीड जिला अदालत में अर्जी देंगे.

क्या है पूरा मामला?

अदालत ने आदेश के अनुसार ये मामला 1999 वर्ष का है. जब संत जगमित्र सुतगिरणी (spinning mill) के लिए जिला बैंक से 3 करोड़ रुपये का कर्जा लिया गया. कर्जा वापस नहीं करने से बकाया राशि तक़रीबन 14 करोड़ की हो गई थी.

संत जगमित्र सुतगिरणी कर्जा मामले में SIT ने तफतीश की थी और तक़रीबन 100 लोगों पर चार्जशीट भी दर्ज की गई. इसमें धनंजय मुंडे भी हैं. मुंडे संत जगमित्र सुतगिरणी के 18 संचालको में से एक संचालक है.

उन्होंने बताया कि असल में ये मामला बहुत ही पुराना है. 1999 में कर्जा दिया गया था और संत जगमित्र सुतगिरणी ने जब तक बीड जिला बैंक कार्यान्वित थी तब तक दस करोड़ रुपये कर्जे के बदले में ग्यारह करोड़ रुपये ब्याज के रूप में  वापस अदा किये थे. लेकिन जब जिला बैंक के अनेक घोटालों का पर्दाफाश हुआ और बैंक बंद हो गया. तब संत जगमित्र सुतगिरणी का लोन अकाउंट NPA में चला गया.

धनजय मुंडे ने कहा के अटैचमेंट के आदेश से पहले 18 संचालकों की जिम्मेदारी क्या थी, ये स्पष्ट करना चाहिए. किसी एक संचालक की जिम्मेदारी क्या थी ये तय करने से पहले कार्रवाई होनी चाहिए. कर्ज की जो राशि है, वो सभी 18 संचालकों को 18 हिस्सों में बराबर देने की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए. इसके बाद हर एक संचालक की प्रॉपर्टी अटैच करनी चाहिए थी.

मुंडे ने कहा कि सहकार कानून के तहत कार्रवाई नहीं हुई. 18 डायरेक्टर में से सिर्फ 7 डायरेक्टर के खिलाफ ऐसा आदेश आना ये एक चौकाने वाली बात है. उन्होंने कहा, हमें ऐसे नोटिस अभी तक प्राप्त नहीं हुए हैं. अभी तक हमारी बात अदालत ने सुनी नहीं है. हमें अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया है. इसी लिए ऐसा निर्णय आना ये अन्याय कारक है.