यह तो बेगैरत, अलटप्पा कूटनीति!

देशों के बीच कूटनीति के तौर-तरीकों में यों कुछ भी संभव है मगर जब राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के स्तर पर कूटनीति होती है तो पद का सम्मान कूटनैतिक कायदे में भी तय हुआ करता है। इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री देश और देश के गौरव का प्रतिनिधी होता है। मतलब वह कोई ऐरा–गैरा नहीं बल्कि गरिमा, गैरत लिए राष्ट्र प्रमुख होता है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री यदि खुद चल कर कहे मुझे मिलना है और आप यदि किसी नदी के किनारे, किसी समुद्री किनारे आराम फरमा रहे है तो मैं वही आ जाता हूं, आपके साथ वीकएंड हो जाएगा, कुछ बात कर लेंगे तो यह एप्रोच पद को बेगैरत बनाती है।  ऐसा करना न खुद प्रधानमंत्री की और उस देश की गरिमा के अनुकूल होता है जिसका वह प्रतिनिधित्व कर रहा होता है।

हां, राष्ट्र सम्मान, गौरव व उसकी कूटनीति में यही कायदा है। तभी सोचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह कैसी अनहोनी कर दे रहे है जो कभी किसी देश के राष्ट्रपति से वक्त मांग कर वुहान जाते है तो कभी सोची! अब ऐसे जाएगें तो न पद माफिक अधिकारिक गारद का सम्मान मिलेगा और न तोपों की सलामी!

तभी सवाल है कि नरेंद्र मोदी का बिना गारद, सलामी पाए विदेश में रहना, वहा जा कर जबरदस्ती विदेशी नेता के गले लगना भारत के प्रधानमंत्री के पद को क्या बेगैरत बनाने वाला नहीं है? वे बिना बुलाए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर जा कर पकौड़े खाने-चाय पीने पहुंच गए। उनका वुहान जा कर चीनी राष्ट्रपति से मिलना हो या सोची में राष्ट्रपति पुतिन के गले जा लगना बिना मकसद याकि ‘एजेंडालेस’ था तो उससे भारत की प्रतिष्ठा को चार चांद लगे या बेगैरत वाला बेड़ा गर्क हुआ, इसका फैसला इस हकीकत में किया जाना चाहिए कि नवाज शरीफ से ‘एजेंडालेस’ मुलाकात से क्या सधा था और शी जिनपिंग या व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात में क्या निकला है?

सोचने और अनुभव में याद करने वाली वाली बात यह भी है कि क्या कभी इस तरह कोई राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री (फिर वह मालदीव का हो या मारीशस का या बांग्लादेश का, अमेरिका-रूस-चीन के राष्ट्रपतियों की तो बात ही छोड़े) भारत आया हैं? हो सकता हैं मैं गलत हूं मगर अपने को ध्यान नहीं पड़ता है कि द्विपक्षीय रिश्तों में छोटे भूटान का राजा भी राष्ट्रपति भवन में गारद से मान-सम्मान की सलामी लिए बिना भारत रहा हो। मैंने कभी नहीं सुना कि कोई नेपाली प्रधानमंत्री या डोकलाम के ताजा मसले में एक पक्ष होने के चलते भूटान का राजा थिंपू से बैग उठा कर भारत के प्रधानमंत्री से ‘एजेंडालेस’ मुलाकात के लिए आया। उसने भी समझने, समझाने की वह अलटप्पे वाली कूटनीति की जैसी प्रधानमंत्री मोदी ने वुहान या सोची में की!  ध्यान रहे इस सबके लिए दूतावास, राजदूत के चैनल बने हुए है और ज्यादा ही यदि समझने, समझाते वाला उलझा मामला है तो विदेश मंत्री आते-जाते है और प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, देश की तरफ से कूटनीति करते है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में एक देश से दूसरे देश के द्विपक्षीय रिश्तों में राष्ट्र प्रमुख का मान-सम्मान (उसकी मेजबानी हो या मेहमानबाजी) राष्ट्र-राज्य की गरिमा,प्रतिष्ठा को अनिवार्यतः लिए हुए होनी चाहिए। आखिर ये पद गैरत की अंहमन्यता लिए होते है। तभी देश का कोई प्रधानमंत्री दूसरे देश में जाता है तो अधिकारिक स्तर पर गैरत, हैसियत अनुसार उसे गारद, तोपों की सलामी या वहां के राष्ट्रप्रमुख की खुद एयरपोर्ट जा कर अगवानी होनी चाहिए।  उस देश के स्वागत के कायदे से एयरपोर्ट राष्ट्रपति या प्रोटोकोल अफसर अगवानी के लिए पहुंचेगा। अधिकारिक मुलाकात से पहले अधिकारिक सम्मान, गारद की सलामी होगी। हां, बहुपक्षीय शिखर सम्मेलनों में अगवानी- विदाई का कायदा अलग हो सकता है मगर दो देशों के राष्ट्र प्रमुखों की मुलाकात न तो पूर्व की पूरी तैयारियों के और न ‘एजेंडालेस’ होती है न ही बिना गारद की सलामी के।

तब अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश जा कर ‘एजेंडालेस’ ‘सम्मानरहित’ विदेशी नेता से सीधे जा कर गले लिपटने का नया जो कूटनैतिक ढर्रा बना रहे है उससे दुनिया में भारत राष्ट्र-राज्य की कैसी इमेज बन रही होगी? फालतू बात है और फालतू तर्क है कि नरेंद्र मोदी विश्व नेता हंै सो जब चाहे तब वे बैग उठा कर राष्ट्रपतियों से मिल दुनिया के मसलों में धमक बता रहे है इसलिए यह भारत के लिए गौरवपूर्ण है।

गौरवपूर्ण भी बात बनती यदि मुलाकात में कोई बड़ी बात निकलती। जब पाकिस्तान के हुक्मरानों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कथित साहस से हद्य परिवर्तन हुआ होता। यदि चीन के राष्ट्रपति जिन पिंग डोकलाम से अपने सैनिक पीछे हटाते या चीनी सेना का निर्माण रूकवाते या अरूणाचल प्रदेश को ले कर स्टेंड बदलते?

मगर लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोचा है कि विदेशी नेताओं के साथ ‘एजेंडालेस’ ‘सम्मानरहित’ सीधे गले लिपटने की एप्रोच से शायद अलटप्पे में कभी कुछ निकल आए और उसे देख उनकी विदेश नीति पर जनता वाह कर बैठे!

लाहौर, वुहान और सोची जाने के प्रधानमंत्री मोदी के तीन वाकिये प्रमाण हैं कि भारत की मौजूदा विदेश नीति कुल मिलाकर अलटप्पे वाली है। भारत चाहता क्या है, इसका कोई एजेंडा है ही नहीं!

बतौर मिसाल सोची की पुतिन-मोदी मुलाकात को ले। मुलाकात का ही नाम देना होगा। इसलिए क्योंकि एजेंडा तो कुछ था ही नहीं। बातचीत के आखिर में ले दे कर यह निकला है कि रूस चीन के साथ मिला हुआ है और पुरानी दोस्ती, उर्जा-हथियारों में भारत की मजबूरी पर भारत का टेंटुआ दबाए हुए है। उधर अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने चीन, रूस, ईरान का टेंटुआ दबा रखा है और इससे मोदी सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि वह दोनों नावों में कैसे सवारी करे! ध्यान रहे अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान हो या हिंद महासागर, आसियान, इंडो-पैसेफिक सबमें भारत के साथ, उसका पक्षधर है जबकि पुतिन और उनके विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव का दो टूक रूख है कि नवंबर 2017 में मनीला में अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, भारत की सहमति वाले इंडो-प्रशांत के रणनीतिक सुरक्षा ढांचे से भारत पल्ला झाड़े। मतलब भारत इस क्षेत्र में चीन और रूस की सुरक्षा- सामरिक सोच के अनुसार चले। ऐसे ही रूस का कहना है कि भारत को चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में शामिल होना चाहिए। वह चीन, रूस और पाकिस्तान वाले शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन में भागीदारी बढ़ाए न कि जापान, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, चीन से खटके हुए आसियान देशों के साथ खिचड़ी पकाएं। यह भी ध्यान रहे कि ट्रंप प्रशासन पिछले साल बने अमेरिकी कानून सीएएटीएसए यानी ‘काउंटरिंग अमरीकाज एडवर्सरिज थ्रू सेक्शन्स ऐक्ट पर अमल में रूस, ईरान जैसे देशों पर पाबंदियां लगा रहा है, उन्हे बढ़ा रहा है। इससे भारत के इन देशों से रिश्ते गड़बड़ाएगे। ईरान, रूस से लेन-देन घटाना होगा।

हिसाब से ये सब अंतरराष्ट्रीय राजनीति के रूटिन मसले है। मगर भारत के विदेश मंत्रालय में ऐसे मामलों में इन दिनों न विदेश मंत्री का मतलब है और न अफसरों का। सबकुछ क्योंकि प्रधानमंत्री ने खुद और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने संभाला हुआ है सो न रणनीति है, न रोडमैप और न विकल्प और ये करेगें खुद सारा काम। 26 मई 2014 के पहले दिन से ले कर आज तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझ आया हुआ है कि वे नवाज शरीफ का स्वागत भी करेगें तो एजेंडालेस लाहौर जा कर पकौड़े भी खाएंगे और फिर चुनाव आते-आते राष्ट्रपति जिन पिंग और राष्ट्रपति पुतिन से समय ले कर उनके सप्ताहंत में बेगानी शादी में अब्दुला दिवाने की तरह पहुंच अलटप्पे में तीर मारेगें कि मैं आ गया हूं तो बताए कि कैसे –क्या किया जाए? और लगे हाथ कुछ फोटोशूट कर भाजपा की जनता को भेज दिये जाए।

सोचे अमेरिका के राष्ट्रपति, रूस या चीन के राष्ट्रपति पर भारत की इस ‘एजेंडालेस’  अलटप्पे वाली कूटनीति का क्या असर हो रहा होगा?  इनमें से कोई अपने प्रधानमंत्री के गले नहीं लगना चाहता है और यह बात फोटो, फुटेज देखने से जाहिर भी होती है मगर अपने प्रधानमंत्री है कि बार-बार चले जा रहे है बिना एजेंडे के गले लगने के फोटोशूट के लिए!

क्या यह भारत राष्ट्र-राज्य के प्रधानमंत्री के पद की गरिमा माफिक है? क्या भारत के प्रधानमंत्री को बिना गारद सलामी, अधिकारिक-औपचारिक तोपों की सलामी के इस तरह बिना एजेंडे के विदेश यात्राएं करनी चाहिए?