यूरोपीय संघ को लेकर ब्रिटेन में मतदान जारी, फैसला शुक्रवार को

लंदन : आज ब्रिटेन की किस्मत का फैसला होने वाला है। ब्रिटेन यूरोपीय संघ में बने रहेगा या नहीं इस पर आज जनमत संग्रह हो रहा है। इसके लिए सुबह 7 बजे से ही मतदान प्रक्रिया शुरु हो गई है, जो रात के 10 बजे तक चलेगा। परिणआमों की घोषणा कल की जाएगी। सबसे पहले मतगणना स्थानीय स्तर पर होगी और यह केंद्र परिणामों की घोषणा करेगा। इसके बाद इन परिणामों को रीजवल सेंटर्स में भेजा जाएगा। यहां से मैनचेस्टर में बने सेंट्रल काउंटिंग सेंटर को भेजा जाएगा। इसके बाद शुक्रवार को परिणाम घोषित किए जाएंगे।

जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने कहा कि सभी सदस्य देश चाहते हैं कि ब्रिटेन संघ में बना रहे। पर कुछ देशों के लिए ब्रिटेन की मांगें स्वीकार करना मुश्किल है। हालांकि इस दिशा में प्रयास चल रहा है। संघ में बने रहने के लिए ब्रिटेन की मांग है कि शरणार्थी नीति में बदलाव किया जाए।

सामाजिक और कल्याणकारी याजनाओं में बदलाव किया जाए और आर्थिक प्रबंधन से जुड़ी नीतियों में बदलाव हो। जनमत संग्रह को लेकर शेयर मार्केट, बॉन्ड व रुपए में उठापटक जारी है। इसे देखते हुए रिजर्व बैंक ने बुधवार को वितीय बाजारों में स्थिति को समानाय बनाए रखने के लिए नकदी समर्तन समेत कई जरुरी कदम उठाए है।

इस जनमत संग्रह में होने वाले फैसले का असर पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत पर भी पड़ेगा। इन दिनों मीडिया में ब्रेक्जिट टर्म बेहद लोकप्रिय है, जिसका अर्थ यूरोपीय संघ में रहने अथवा बाहर निकलने से है। ब्रिटेन के भीतर पहली बार यूरोपियन यूनियन के बाहर रहने को लेकर चर्चा तब शुरू हुई जब ग्रीस पर आर्थिक संकट मंडरा रहा था।

ग्रीस व इटली के गंभीर संकट का असर यूरोपियन यूनियन के अन्य देशों पर भी पड़ रहा था। ब्रिटेन अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले आर्थिक व सामरिक रुप से अधिक सशक्त है। ब्रिटिशरों का मानना है कि यदि वे यूरोपियन यूनियन में बने रहते है, तो उन्हें पहचान का संकट पैदा हो सकता है।

ब्रिटेन ने इसी कारण से बेहद कम शरर्णार्थियों को अपनाया था। हांला कि ज्यादातर अर्थशास्त्री मानते है कि ब्रिटेन का यूरोपीय यूनियन से बाहर होना घाटे का सौदा है। यहां तक कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन भी मानते है कि ऐसा होने से ब्रिटेन एक सदी पीछे चला जाएगा।

ब्रिटेन के ईयू से बाहर जाने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। सबसे बड़ी चिंता यूरो मुद्रा के कमजोर होने की है। अगर यूरो कमजोर होती है तो डॉलर मजबूत होगा। लिहाजा इसका असर भारतीय मुद्रा रुपया पर भी पड़ेगा। दूसरी ओर ब्रिटेन के रास्ते भारत कई देशों में व्यापार करता है, जो कि प्रभावित होगा।

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