राजस्थान / स्वाइन फ्लू ने 5 जानें और लीं; अब तक 25 दिन में 9 मरीजों की मौत हो चुकी, 109 में पुष्टि

उदयपुर. स्वाइन फ्लू से उदयपुर में शुक्रवार को एक ही दिन में रिकॉर्ड 3 मरीजों की मौत हो गई, वहीं 8 लोगों में फ्लू की पुष्टि हुई है। पिछले 25 दिन में 9 मरीजों की मौत हो चुकी है और 109 मरीजों में पुष्टि हुई है।

शुक्रवार को झाड़ोल निवासी 65 वर्षीय तुलसीराम और डूंगरपुर की 70 वर्षीय बुजुर्ग सिकंदर की एमबी अस्पताल के स्वाइन फ्लू वार्ड में मौत हो गई। वहीं बाठेडा की सराय, वल्लभनगर निवासी 35 वर्षीय युवक सिकन्दर पुत्र रूस्तम खां की मौत गांव में हुई है। एमबी अस्पताल अधीक्षक डॉ. लाखन ने बताया कि मृतक तुलसीराम हाइपर टेंशन-बीपी और सुब्बानी डायबिटीज और मोटापा ग्रस्त थे।

स्वाइन फ्लू वाॅर्ड में अभी 15 मरीज भर्ती हैं। इसी दिन आठ मरीज पॉजिटिव निकले हैं जिनमें 6 उदयपुर के हैं। आरएनटी मेडिकल कॉलेज के 3 डॉक्टर स्वाइन भी फ्लू की चपेट में आ चुके हैं। डिप्टी सीएमएचओ डॉ. राघवेंद्र राय ने आरएनटी के हरेक डॉक्टर को टेमीफ्लू खिलाने की सलाह दी गई है।

24 दिनों में 9 लोग मरे

बीकानेर. स्वाइन फ्लू से शुक्रवार को दो और लोगों की मौत हो गई तो पांच नए रोगी चिह्नित हुए। पिछले 24 दिनों में इस रोग से मरने वालों का आंकड़ा 9 तक पहुंच गया है जबकि 120 लोगों में इस रोग के लक्षण मिले। शुक्रवार को बीकानेर में मुक्ताप्रसाद नगर में रहने वाली 45 वर्षीय आशादेवी खत्री की स्वाइन फ्लू से मौत हो गई। वहीं नोहर निवासी 65 वर्षीय हनुमान ने भी पीबीएम हॉस्पिटल में दम तोड़ दिया।

एनआईवी की टीम करेगी जांच

जयपुर. प्रदेश में स्वाइन फ्लू से लगातार हो रही मौतों पर आखिर कंट्रोल क्यों नहीं हो पा रहा है, आखिर वे क्या कमियां हैं, जिनकी वजह से माैतें हो रही हैं। कुछ ऐसे ही कारणों को जानने के लिए नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे (एनआईवी) की टीम जयपुर पहुंची। स्वाइन फ्लू इंफ्लुएंजा का म्यूटेशन होना भी इसका बड़ा कारण माना जा रहा है। हालांकि जयपुर लैब में हुई जांच में अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन डॉक्टर्स का मानना है कि वायरस और इंफ्लुएंजा का म्यूटेशन हर साल होता है। लेकिन वह इतना अधिक प्रभावी नहीं होता। लेकिन लगातार हो रही मौतें और स्क्रीनिंग व मॉनिटरिंग के बावजूद भी केस का बढ़ना इस ओर इंगित करता है कि म्यूटेशन काफी अधिक प्रभावी रूप से हुआ है। ऐसे में आमजन को अधिक सतर्कता की जरूरत है।

नाकामी इसलिए तो नहीं…

विभाग की ओर से की जा रही स्क्रीनिंग में कमी की वजह से पीड़ित के आसपास के लोग कुछ दिन बाद पीड़ित हो रहे हैं। वहीं चिकित्सा विभाग के पास टीम की कमी है। स्क्रीनिंग के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और नर्सिंग स्टूडेंट को भेजा जा रहा है। लेकिन आमजन को ना तो वे बेहतर तरीके से समझा पाते हैं और ना ही आमजन उनको सपोर्ट करता है। साथ ही मॉनिटरिंग के लिए भी पर्याप्त स्टाफ नहीं है। ऐसे में जिन जगह की स्क्रीनिंग की जाती है, वहां सही मॉनिटरिंग नहीं हो पाती और प्रभावित स्क्रीनिंग से बच जाते हैं।