विधायिका में प्रमुख, फिर क्यों प्रोटोकॉल में पीछे किया

भोपाल (ब्यूरो)। प्रोटोकॉल में विधानसभा अध्यक्ष को मुख्यमंत्री के बराबर और उपाध्यक्ष को मंत्री के बराबर दर्जा न देने से विधानसभा अध्यक्ष नाराज हैं। इस मामले में बुधवार को उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव एमके वार्ष्णेय को तलब किया। बैठक में चर्चा के दौरान विधानसभा के प्रमुख सचिव भगवान दास ईसरानी ने जीएडी प्रमुख सचिव वार्ष्णेय से पूछा कि जिस प्रकार कार्यपालिका के प्रमुख मुख्यमंत्री और न्यायपालिका के प्रमुख मुख्य न्यायाधीश हैं।

उसी प्रकार विधायिका के प्रमुख विधानसभा अध्यक्ष होते हैं, फिर इन्हें प्रोटोकॉल में मुख्यमंत्री के बराबर क्यों नहीं रखा गया। इस मामले में जीएडी प्रमुख सचिव ने कहा कि मैंने हाल ही में जीएडी का काम-काज संभाला है। इसलिए पता करने के बाद ही कुछ बता पाऊंगा।

अध्यक्ष डॉ. शर्मा ने कहा कि आपने अब तक मप्र भवन में विधायकों के सुविधाओं की कटौती को पहले की तरह बहाल नहीं किया, जबकि इस मामले में दो बैठकें हो चुकी हैं। इस पर वार्ष्णेय ने कहा कि विधायकों की सुविधा में कटौती का निर्णय मुख्यमंत्री स्तर से हुआ है, इसके लिए हमने प्रस्ताव तैयार कर मुख्य सचिव अंटोनी डिसा को भेज दिया है। जल्द ही इस पर निर्णय हो जाएगा।

वन मंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार ने अध्यक्ष से कहा कि आप इनसे कुछ मत कहिए, विधानसभा से एक विशेषाधिकार का नोटिस दे दें। खुद ही विधायकों की सुविधा बहाल हो जाएगी। इस पर अध्यक्ष ने कहा कि आप इस मामले में तत्काल कार्रवाई करें। उन्होंने यह भी कहा कि तीन दिन पहले एक विधायक से मप्र भवन में पूरे पैसे वसूले गए, यह गलत है।

इसे गंभीरता के साथ लें। उल्लेखनीय है कि पहले विधायकों को एक माह में तीन दिन और अधिकतम एक साल में 15 दिन तक नई दिल्ली के मप्र भवन, मध्यांचल भवन और मुंबई के मध्यालोक भवन में मुफ्त ठहरने की सुविधा थी। राज्य सरकार ने इस सुविधा को चार माह पहले समाप्त कर दिया।

नई व्यवस्था में विधायकों से एक वर्ष में 15 दिन तक आधा शुल्क और इससे अधिक ठहरने पर पुरा शुल्क लेने का प्रावधान किया गया है। जिस पर विधायकों ने आपत्ति जताई है।

विधायक भी उठा चुके हैं प्रोटोकॉल की बात

सामान्य प्रशासन विभाग की परामर्शदात्री समिति की बैठक में मंगलवार को विधायकों ने भी प्रोटोकॉल का मुद्दा उठाया था। उनका कहना था कि हम कलेक्टर को कोई पत्र देते हैं तो वह तत्काल सुनवाई करते हुए उसे अपर कलेक्टर को भेज देते हैं, इसके बाद उस पत्र को कार्यवाही के लिए तहसीलदार के पास जाता है। विधायकों का कहना है कि तहसीलदार के पास पत्र जाकर ठंडे बस्ते में चला जाता है। उसकी सुनवाई नहीं होती। उन्होंने बैठक में अफसरों से पूछा कि क्या हमें तहसीलदार को अपने घर बुलाने का अधिकार है। इस पर अफसरों ने मना कर दिया कि तहसीलदार द्वितीय श्रेणी का अधिकारी होता है उसे विधायक अपने निवास पर नहीं बुला सकते। विधायकों ने कहा कि हम तहसीलदार के कार्यालय में जाते हैं तो सुनवाई नहीं होती। हमे प्रोटोकॉल में ऊपर किया जाए, जिससे मैदानी अफसर हमारी बात को प्रभाव के साथ सुन सकें।

समिति में उठा था मामला

विधायकों की वेतन भत्तों सहित प्रोटोकॉल का मामला समिति में उठा था। उसी के चलते बुधवार को जीएडी पीएस को विधानसभा अध्यक्ष ने चर्चा के लिए बुलाया था। यह नया मामला नहीं है पहले से चल रहा है। पूर्व में दिए गए निर्देश के पालन को लेकर बैठक में चर्चा हुई है। भगवानदास इसरानी, प्रमुख सचिव विधानसभा

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