सड़क पर हुड़दंंग मचाने वाले अपना घर जलाकर दिखाएं : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को तबाह कर गुंडागर्दी की घटनाओं को गंभीर हालात करार दिया है।

साथ ही कहा कि वह अब इससे संबंधित कानून के संशोधन के लिए सरकार का इंतजार नहीं करेगा। यानी अब आने वाले समय में सर्वोच्च अदालत सार्वजनिक स्थलों पर विरोध-प्रदर्शन करने की गाइड लाइंस जारी करेगी।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में जस्टिस एएम खानविल्कर और डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने शुक्रवार को कहा कि वह देश में विरोध-प्रदर्शन करने के नियम-कायदों पर दिशा-निर्देश देंगे।

इससे पूर्व, अटर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने खंडपीठ को बताया कि गुंडागर्दी, उपद्रव और दंगों की घटनाओं पर उस क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक (एसपी) की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि हिंसक प्रदर्शन और दंगे की घटनाएं हर दिन देश में एक न एक स्थान पर होती ही हैं।

फिर चाहे वह महाराष्ट्र का मराठों का आरक्षण के लिए आंदोलन हो, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के मामले में देश में हुए हिंसक प्रदर्शन हों और हाल में कांवड़ियों की हिंसक वारदातें हों।

प्रदर्शनकारी अपने घर क्यों नहीं जलाते : चीफ जस्टिस कांवड़ियों का जिक्र आने पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि इलाहाबाद को वाराणसी जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर इन्हीं कांवड़िया शिव भक्तों के कारण जाम लगा है।

इस पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि जो लोग दूसरों की संपत्तियों को बर्बाद करते हैं, वह अपने घर क्यों नहीं जलाते हैं?

वेणुगोपाल ने कहा कि जब फिल्म पद्मावत रिलीज होने वाली थी तो एक संगठन ने खुलेआम उस फिल्म की अभिनेत्री की नाक काटने की धमकी दी थी। उस मामले में कुछ नहीं हुआ। एक एफआइआर तक दर्ज नहीं हुई।

सर्वोच्च अदालत ने सरकार से सुझाव मांगे :

इस पर सर्वोच्च अदालत ने सरकार के सबसे बड़े अधिवक्ता से पूछा कि तब आपका इस पर क्या सुझाव है? इस पर वेणुगोपाल ने कहा कि संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी सुनिश्चित कर दीजिए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली में अवैध निर्माण तब से कम हो गए हैं जब से सर्वोच्च अदालत ने अवैध निर्माण पर उस क्षेत्र के डीडीए अफसर को जिम्मेदार ठहराया है।

वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार इन विरोध-प्रदर्शनों से निपटने के लिए मौजूदा कानून में संशोधन करने पर विचार कर रही है। कानून को आवश्यकतानुसार बदलने के लिए सरकार को अदालत की अनुमति चाहिए।

इस पर खंडपीठ ने कहा कि हालात बहुत गंभीर हो चुके हैं और इसे रोकना होगा। तब अदालत ने कोडंगलूर फिल्म सोसाइटी की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित कर दिया।

2009 में भी जारी हो चुके हैं दिशा-निर्देश :

उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च अदालत ने वर्ष 2009 में अपने एक फैसले में प्रदर्शनों ने संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसमें कहा गया था कि किसी भी प्रदर्शन के आयोजकों को इस दौरान हुई किसी भी सार्वजनिक और निजी संपत्ति की क्षति पर जिम्मेदार माना जाएगा। खंडपीठ ने तब यह भी आदेश दिया था कि पुलिस प्रशासन ऐसे प्रदर्शनों की जवाबदेही तय करने के लिए प्रदर्शन की वीडियोग्राफी करेगा।