सैनिकों की तरह रहते थे ये नवाब, दूसरे विश्वयुद्ध में उड़ाए थे फाइटर प्लेन

भोपाल। 1 नवंबर को मध्यप्रदेश का 62वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है कुछ रोचक किस्से, जो मध्यप्रदेश को अलग पहचान दिलाती है। हम बात कर रहे हैं भोपाल रियासत के आखिरी नवाब हमीदुल्ला खान की, जो अपनी लाइफ स्टाइल की वजह से काफी मशहूर थे।
-भोपाल में नजर आने वाली खुली जीप का शौक नवाब के जमाने से ही भोपाल में आया था जो आज तक लोगों के सिर चढ़कर बोलता है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि भोपाल के नवाब बेहतरीन फाइटर पायलट थे और उनका अपना जहाजी बेड़ा था, जिसमें डिकोटा जैसे प्लेन और हेलीकॉप्टर शामिल थे।
-इतिहासकार बताते हैं कि, जिस जगह पर आज मध्य प्रदेश सरकार का स्टेट हैंगर है वो किसी जमाने में भोपाल नवाब का एयरपोर्ट हुआ करता था। भोपाल नवाब के हेलीकॉप्टर के लिए रियासत के समय में जगह-जगह हेलीपेड बनाए गए थे।
नवाब को देखने पहुंचती थी भारी भीड़
लोगों को रोजगार से जोड़ने नवाब हमीदुल्ला खान ने कार्ड बोर्ड फैक्ट्री, ग्राउंड ट्रक टेलीफोन स्टेशन एवं बैरागढ़ में हवाई अड्डे की तामीर कराई। बैरागढ़ में नवाब भोपाल ने जो हवाई अड्डा बनवाया था। पहले उसका उपयोग वो अपने लिए करते थे। बाद में ये हवाई अड्डा सरकार के अधिकार क्षेत्र में आ गया और आज इस हवाई अड्डे को स्टेट हैंगर के रूप में जाना जाता है। उस दौर में भोपाल की जनता नवाब को हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर उड़ाते हुए देखने के लिए काफी संख्या में पहुंचती थी।
सैनिकों की वेशभूषा में रहना पसंद करते थे भोपाल नवाब
डॉ सैयद इफ्तेखार अली बताते हैं कि नवाब भोपाल एक बहुत अच्छे शूटर और फाइटर पायलट थे। ज्यादातर समय पर नवाब की वेशभूषा सैनिकों की तरह होती थी। उन्हें सैनिकों और आम आदमी की तरह पसीना बहाने में मजा आता था। डॉ. अली बताते हैं कि चिकलौद में उनका 7 सौ एकड़ का फार्महाउस हुआ करता था। उसमें नवाब हमीदुल्ला खान खुद ट्रैक्टर चलाकर जुताई करते थे। फार्महाउस के पास बनी एक चट्टान पर बैठकर खाना खाते थे।
जगह-जगह बनवा रखे थे हेलीपेड
भारत सरकार के मर्जर एग्रीमेंट में उनके वाहनों के शौक और हवाई बेड़े की जानकारी मिलती है। उनके पास उस दौर की एक से बढ़कर एक जीप हुआ करती थीं। उनके हवाई बेड़े में डिकोटा था तो उस दौर के अत्याधुनिक हेलीकॉप्टर भी थे।
दूसरे विश्व युद्ध में शामिल हुए थे नवाब
1942 के दूसरे विश्व युद्ध में उन्होंने हिस्सा लिया था और एक फाइटर पायलट के तौर पर उन्होंने अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया था। उन्हें कई तरह के सम्मान भी हासिल हुए हैं। 1943 में उन्हें एअर कमांडर, 1945 में एअर वाइस मार्शल और 1946 में उन्हें मेजर जनरल के टाइटल से नवाजा गया था