स्टडी का टाइट शेड्यूल स्टूडेंट्स में बढ़ा रहा है हद से ज्यादा टेंशन ,बच्चे हो रहे है डिप्रेशन के शिकार ..

इंदौर:। एजुकेशन और करियर को लेकर बढ़ते कॉम्पिटीशन ने स्टूडेंट्स को मशीन बना दिया है। वे सुबह से शाम तक किताबों के बीच घिरे रहते हैं। स्कूल होमवर्क, ट्यूशन वर्क और प्रोजेक्ट्स ने स्टूडेंटस का शेड्यूल बहुत टाइट कर दिया है। साथ ही वे जरा सा भी समय खुद को नहीं दे पा रहे है ,जिससे उनका स्वाभाव भी चिड़चिड़ा हो रहा है और सबसे बड़ा चिंता का विषय यह है की बच्चो के डिप्रेशन में जाने की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है |इसके कारण बच्चों में बढ़ता प्रेशर स्टे्रस के रूप में सामने आ रहा है। इसकी वजह से छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, उग्र होना और मारपीट करना उनके स्वभाव का हिस्सा बनता जा रहा है। खासकर बच्चों में इस प्रकार की परेशानियां उनके एग्जाम के नजदीक होते ज्यादा बढ़ जाती है। कोर्स पूरा करने की जद्दोजहद और कम समय उनके स्ट्रेस लेवल को काफी बढ़ा देता है।
ऐसे दिनों में पैरेंट्स बच्चों के ज्यादा करीब रहें और उन्हें हौसला दें। साथ ही अपने बच्चों की एक्टिविटी क्लास के लिए उन पर प्रेशर न डालें। इसके बजाय उन्हें घर से बाहर निकलने दें, दोस्तों से मिलने दें और खुद भी घर का माहौल फ्रेंडली बनाएं। जिससे वे सभी इस समस्या से निजात पा सके|वही पेरेंट्स अपने बच्चों को ज्यादा समय दें शहर के साइकोलॉजिस्ट का मानना है कि पैरेंट्स बच्चों के लिए ज्यादा समय निकालें। बच्चे की परेशानी को समझने का प्रयास करें। उन्हें बाहर निकलने और दोस्तों से मिलने के लिए प्रेरित करें। विश्वास दिलाएं कि हर कंडीशन में आप उनके साथ हैं। साथ ही हर जरा जरा सी बात पर उनपर गुस्सा करना बंद करे |
एक्जाम टाइम में स्टे्रस बढ़ जाता है, जिसका बड़ा कारण कॉम्पिटीशन है। पैरेंट्स के साथ स्कूल भी अपनी जिम्मेदारी निभाएं। स्कूलों को प्रोजेक्ट्स और कोर्स वर्क एक्जाम टाइम से पहले ही पूरे करा लेना चाहिए।