56 वर्षों से लिख रहे हैं पत्र, गुरुजी के घर पर रोजाना लगती है भीड़

जगदलपुर । ज्ञान का महत्व तभी जब उसका सदुपयोग हो। शिक्षक राजाराम यादव इस मर्म को युवावस्था में ही समझ गए थे, तभी तो पिछले 56 वर्षों से वह चिठ्ठियां (पत्रप्रपत्र) लिखकर गांव और गरीबों की आवाज बने हुए हैं। उनका मानना है कि अपनी बात को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने का यह सबसे सशक्त माध्यम है। विषय वाजिब हो तो देर-सबेर सुनवाई जरूर होती है। आलम यह कि रोजाना राजाराम यादव के घर आवेदन लिखवाने वालों की भीड़ लगी रहती है।

प्रधानमंत्री से लेकर पटवारी तक के लिए वह आवेदन लिखते हैं, वो भी निशुल्क। कागज, लिफाफा और टिकट का खर्च भी खुद वहन करते हैं। लोग प्यार से उन्हें कहते हैं -चिट्ठी वाले गुरुजी। उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में 1943 में जन्मे राजाराम यादव मैट्रिक की पढ़ाई करने के बाद बस्तर (छत्तीसगढ़) आ गए।

1962 में उन्हें ग्राम नगरनार के सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी भी मिल गई। राजाराम जी बताते हैं कि बस्तर में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, आवागमन के साधनों और अन्य सुविधाओं का काफी अभाव था।

दक्षिण बस्तर के तब के अति पिछड़े कोंटा या गादीरास क्षेत्र हों या फिर उत्तर बस्तर के कथित रूप से विकासशील क्षेत्र, इनकी बेहतरी के लिए गांव वालों के आग्रह पर वह शासन-प्रशासन को पत्र भेजते रहते थे। पत्र लिखने का यह सिलसिला आज भी जारी है।

2005 में सेवानिवृत्ति के बाद तो यह काम और तेज हो गया। नगरनार में निर्माणाधीन स्टील प्लांट की चहारदीवारी से सटे उनके आवास पर प्रतिदिन जरूरतमंदों की भीड़ जुटती है। इनमें ज्यादातर अशिक्षित या अल्प शिक्षित लोग होते हैं।

लोगों को अपनी बारी आने का घंटों इंतजार भी करना पड़ता है। इन सबका उद्देश्य राजाराम यादव से शिकायती, समस्यागत, मांग संबंधी, व्यक्तिगत अथवा सामूहिक दिक्कतों से जुड़ा आवेदन तैयार करवाना होता है।

राजाराम भी किसी को निराश नहीं करते। कभी-कभी वह खुद गांव और गांव वालों की समस्याओं और शिकायतों से जुड़ा आवेदन लिखकर संबंधित दफ्तर तक पहुंचा आते हैं। वह कहते हैं कि उनके पत्र कभी-कभी रद्दी की टोकरियों में भी डाल दिए जाते हैं, लेकिन वह इसकी परवाह किए बिना सतत पत्र लिखते रहते हैं। वह इस बात पर भरोसा करते हैं कि यदि वाजिब विषय पर बार-बार शासन-प्रशासन को पत्र लिखा जाए तो देर से ही सही, कार्रवाई जरूर होती है।

ऐसा नहीं कि राजाराम यादव के पास गरीब तबके के लोग ही पत्र लिखवाने आते हैं। विभिन्न् प्लांटों में कार्यरत कर्मचारी भी पत्र लिखने का आग्रह लेकर उनके पास पहुंचते हैं। नगरनार स्टील प्लांट के भू-प्रभावितों के पुनर्वास व विस्थापन से जुड़ी मांगों, शिकायतों और समस्याओं पर 18 वर्षों में उन्होंने हजारों पत्र लिखे। पुनर्वास मामलों में उनके लिखे पत्रों पर कार्रवाई भी हुई। प्रभावितों को पुनर्वास नीति से अलग हटकर भी कई लाभ मिले।

नगरनार के पूर्व सरपंच लैखन बघेल कहते हैं कि चिट्ठी वाले गुरुजी ने गांव और गरीबों की बेहतरी के लिए ढेरों पत्र शासन को लिखे हैं, लोगों की राह आसान की है। स्टील प्लांट में काम करने वाले संयुक्त मजदूर इस्पात संघ के सचिव महेंद्र जॉन कहते हैं कि यादव गुरुजी से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है। भू-प्रभावितों को न्याय दिलाने में उनके द्वारा चलाया गया पत्र-प्रपत्रों का सिलसिला काफी काम आया। इलाके में तमाम लोगों के ऐसे ही अपने-अपने अनुभव हैं …चिट्ठी वाले गुरुजी को लेकर।