EXCLUSIVE: बीएड परीक्षा में 7000 छात्र ‘फर्जी’

तरह-तरह की धांधली के लिए कुख्यात डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में बीएड परीक्षा 2013-14 में भी हुआ बड़ा ‘खेल’ सामने आया है।

हाईकोर्ट के आदेश की आड़ में सात हजार से अधिक ऐसे छात्रों को भी परीक्षा में शामिल कर लिया गया जिन्होंने संयुक्त प्रवेश परीक्षा दी ही नहीं थी। इसका खुलासा तब हुआ जब काउंसलिंग में पंजीकृत हुए छात्रों के मुकाबले भारी संख्या अधिक छात्रों के अंक मार्कशीट तैयार करने वाली एजेंसी को भेजे गए। इस मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं।

वर्ष 2005 से हुई परीक्षाओं में गड़बड़ी की एसआईटी जांच पहले से ही जारी है। बता दें, वर्ष 2013-14 के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा गोरखपुर विश्वविद्यालय ने कराई थी। यहां हुई काउंसलिंग में 191 कालेजों के 13,449 छात्र शामिल हुए। जुलाई में हुई मुख्य परीक्षा में इनमें से 12,822 ही बैठे। इसके बाद भी यह परीक्षा देने वाले कुल परीक्षार्थियों की संख्या 20,097 रही।

गोरखपुर विश्वविद्यालय ने डा. बीआरए विश्वविद्यालय के माध्यम से रिजल्ट बनाने वाली एजेंसी को काउंसलिंग में पंजीकृत 13,449 छात्रों की ही सूची सौंपी। हालांकि एजेंसी के पास अंक 20,097 छात्रों के पहुंचे। दोनों में बड़ा अंतर देखते हुए एजेंसी ने कुलसचिव को सूचित किया।

उन्होंने यह तो बताया कि इन्हें हाईकोर्ट के आदेश पर परीक्षा में शामिल किया गया था, लेकिन मय साक्ष्य इनकी पात्रता का विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया। तब एजेंसी ने कुलपति प्रो. मोहम्मद मुजम्मिल को अवगत कराते हुए मार्कशीट के संबंध में निर्देश मांगे। इस गड़बड़ी को गंभीरता से लेते हुए कुलपति ने जांच के लिए कमेटी बना दी है। इस बारे में ‘अमर उजाला’ द्वारा पूछे जाने पर तत्कालीन कुलसचिव केएन सिंह (अब कार्यवाहक) ने टालने वाला जवाब दिया। बोले, गोरखपुर विश्वविद्यालय से मिली सूची के साढ़े तेरह हजार छात्रों में से आठ हजार का सत्यापन हो चुका है। ‘नॉन काउंसलिंग’ वाले छात्रों के सवाल पर बोले, इन्हें बाद में देखा जाएगा।

काउंसलिंग में करीब 40 फीसदी सीट खाली रहने पर निजी कालेज हाईकोर्ट की शरण में गए। कोर्ट ने प्रवेश परीक्षा देने वाले छात्रों को प्रवेश देने और मुख्य परीक्षा में शामिल कराने का आदेश दिया। इसके लिए कालेज को दो समाचार पत्रों में विज्ञापन देकर सूचित करना था। छात्रों को प्रवेश तो दिए गए लेकिन उन्हें जिन्होंने प्रवेश परीक्षा नहीं दी थी। हाईकोर्ट द्वारा प्रवेश के लिए लगाई गई शर्त पूरी न होने से ये छात्र ‘फर्जी’ हो गए।

अतिरिक्त छात्रों को परीक्षा दिलाने में विश्वविद्यालय और कालेज संचालकों के बीच मिलीभगत का शक है। क्योंकि इन छात्रों की पात्रता का परीक्षण किए बिना ही प्रवेश पत्र विश्वविद्यालय ने ही जारी किए थे। इससे पहले उसने कालेजों से इनका विवरण मांगा ही नहीं।

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