Navaratri 2018 : क्‍यों मनाए जाते हैं नवरात्र, जानें क्‍या है महत्‍व

नई द‍िल्‍ली : नवरात्र की धूम पूरे भारत में नजर आती है और इस दौरान भक्‍त मां के दर्शन के लिए मंद‍िरों में उमड़ते हैं। साथ ही व्रत और व‍िध‍िवत पूजा के साथ उनको प्रसन्‍न करने की कोशिश करते हैं ताकि वे उनकी मनोकामनाएं पूरी करें। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि नवरात्र मनाए क्‍यों जाते हैं और इसका महत्‍व क्‍या है। दरअसल, नवरात्र मनाने के पीछ जो पौराण‍िक कहानी बताई है वो मां दुर्गा की उत्‍पत्‍त‍ि से भी जुड़ी है।

बता दें क‍ि नवरात्र के नौ द‍िनों में मां दुर्गा के जिन स्वरूपों की पूजा होती है उनमें माता शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि देवी हैं। नवरात्रों में नौ दिनों तक देवी माता जी का विशेष श्रृंगार करना चाहिए। चोला, फूलों की माला, हार और नए कपड़ों से माता जी का श्रृंगार किया जाता है। वहीं नवरात्र में देशी गाय के घी से अखंड ज्योति जलाना मां भगवती को बहुत प्रसन्न करने वाला कार्य होता है। लेकिन अगर गाय का घी नहीं है तो अन्य घी से माता की अखंड ज्योति पूजा स्थान पर जरूर जलानी चाहिए।

महिषासुर का किया था वध 
मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ आपने भैंस के शरीर से निकल रहे एक मानव आकृति को देखा होगा। इसके हाथों में कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र होते हैं। यह महि‍षासुर है जिसका वर्णन दुर्गासप्तशती के तीसरे अध्याय में है। महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था इसने अपने बल से देवताओं का साम्राज्य छीन लिया और स्वयं इन्द्र बनकर स्वर्ग पर राज करने लगा।

देवतागण ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शरण में गए। महिषासुर को वरदान प्राप्त था कि कुंवारी कन्या के हाथों ही उसका वध होगा। इसलिए तीनों देवों ने मिलकर अन्य देवाताओं की सहायता से एक नारी रूप को प्रकट किया और अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इस देवी ने महिषासुर को युद्घ के लिए ललकारा और रण में महिषासुर का वध किया, इसलिए माता का एक नाम महिषासुरमर्दनी भी है।

देवी ने जिस स्थान पर महिषासुर का वध किया था वह स्थान देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह स्थान हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित नैना देवी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है।

नैना देवी शक्तिपीठ की कथा 
पुराणों की कथा के अनुसार यहां पर देवी सती के नैन गिरे थे। इसलिए यह नैनाशक्ति शक्तिपीठ कहलाया। इस स्थान पर शक्तिपीठ होने की जानकारी सबसे पहले एक गुर्जर लड़के को हुई जो हर दिन यहां गाय चराने आता था। इसने देखा कि एक गाय हर दिन नियम स्थान पर जाकर खड़ी हो जाती है और उसके स्तन से दूध की धारा बहने लगती है।

कई दिनों तक ऐसा ही होता रहा तब नैना देवी गुर्जर लड़के के सपने में आई और बताया कि जहां आकर गाय के स्तन से दूध की धारा बहने लगती है वहां मेरा पिण्ड है। मै नैना देवी हूं। गुर्जर लड़के ने यह बात उस समय के राजा बीरचंद को बताई। लड़के की बात सुनकर महाराजा स्वयं उस स्थान पर गए और अद्भुत नजरा देखकर आत्मविभोर हो गए। राजा बीरचंद ने नैना देवी का मंदिर बनवाया।